राजभाषा आयोग | Official Language Commission
राजभाषा आयोग
संविधान के भाग 17 (अनुच्छेद 344)के अन्तर्गत उपबंधित राजभाषा आयोग के कार्यों, उसकी सिफारशों तथा संसदीय समिति और राष्ट्रपति आदेशों का विस्तारपूर्वक अध्ययन एवं विश्लेषण -
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 344 के अन्तर्गत यह प्रावधान है कि- राष्ट्रपति, इस संविधान के प्रारम्भ से 5 वर्ष की समाप्ति पर और तत्पश्चात् ऐसे प्रारम्भ से दस वर्ष की समाप्ति पर, आदेश द्वारा, एक आयोग गठित करेगा जो एक अध्यक्ष और आठवीं अनुसूची में दिये गये विभिन्न भाषाओं का प्रतिनिधित्व करने वाले ऐसे अन्य सदस्यों से मिलकर बनेगा। जिनको राष्ट्रपति नियुक्त करे और आदेश में ही आयोग की प्रक्रिया एवं कार्यों का भी विनिश्चय होगा।
इसके अनुसार ही 7 जून 1955 को बी. जी. खरे की अध्यक्षता में राजभाषा आयोग का गठन किया गया, जिसमें 20 सदस्य थे।
राजभाषा आयोग के कार्य
भारतीय संविधान के भाग 17 (अनुच्छेद 344(2) के अन्तर्गत ही राजभाषा आयोग के कार्यों को निर्दिष्ट किया गया है:
- संघ के शासकीय प्रयोजनों के लिए हिन्दी भाषा के अधिकाधिक प्रयोग,
- संघ के किसी या सभी शासकीय प्रयोजनों के लिए अंग्रेजी भाषा के प्रयोग पर निर्बन्धों,
- अनुच्छेद 348 में उल्लिखित सभी या किन्हीं प्रयोजनों के लिए प्रयोग की जाने वाली भाषा,
- संघ के किसी एक या अधिक विरनिष्ट प्रयोजनों के लिए किये जाने वाले अंको के रुप,
- संघ की राजभाषा तथा संघ और किसी राज्य के बीच या एक राज्य और दसरे राज्य के बीच पत्रादि की भाषा और उनके प्रयोग के सम्बन्ध में राष्ट्रपति द्वारा आयोग को निर्देशित किये गये किसी अन्य विषय, के बारे में सिफारिशें करे।
राजभाषा आयोग की सिफारशें
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 344 के अन्तर्गत राजभाषा आयोग द्वारा कार्यों के सम्बन्ध में की जाने वाली सिफारिशों का भी प्रावधान है। राजभाषा आयोग अपनी सिफारिशों में:
- भारत की सांस्कृतिक, औद्योगिक और वैज्ञानिक उन्नति का, और
- लोक सेवाओं में अहिन्दी भाषी क्षेत्रों के व्यक्तियों के न्यायसंगत दावों और हितों का पूर्णतया ध्यान रखेगा।
इस प्रकार हमने देखा कि राजभाषा आयोग के कार्यो तथा उसके द्वारा उससे सम्बन्धित की जाने वाली सिफारिशों का सविस्तार पूर्वक प्रावधान भारतीय संविधान में किया गया है।
1955 में गठित राजभाषा आयोग को यह उत्तरदायित्व सौपा गया कि वह अपने विभिन्न कार्यों के साथ ही साथ यह ध्यान रखे कि सभी भाषाओं का विकास सुनिश्चित रुप में होना चाहिए। देश के सांस्कृतिक, और वैज्ञानिक विकास का ध्यान रखते हुए ही अपनी सिफारिशें प्रस्तुत करना चाहिए।
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