मालवा के लिये हुमायूँ एवं बहादुरशाह का युद्ध | Humayu and Bahadurshah war for Malwa
मालवा के लिये हुमायूँ एवं बहादुरशाह का युद्ध
मालवा के लिये हुमायूँ एवं बहादुरशाह का युद्ध
हुमायूँ ने अफगान एवं बंगाल की समस्या को खत्म करने से पूर्व बहादुरशाह के मामले को सुलझाने का निर्णय लिया क्योंकि, वह बहुत धनी महत्त्वाकांक्षी एवं चालाक था। इसलिये उससे मुगल सम्राट को अधिक खतरा हो सकता था ।
बादशाह हुमायूँ ने एक बार बहादुरशाह से लड़ने का निर्णय लेकर तैयारियों में देरी नहीं की। नवम्बर, सन् 1534 ईस्वी से लेकर जनवरी सन् 1535 ईस्वी तक आगरा में सभी तैयारियाँ पूरी कर ली गयी, फरवरी तक युद्ध की संपूर्ण तैयारियाँ हो चुकी थी। बादशाह हुमायूँ सेना लेकर स्वयं रायसेन की ओर गया, जो कि पहले से ही बहादुरशाह द्वारा विजित कर लिया गया था । शाही सेना का पड़ाव सर्वप्रथम बेतवा नदी के तट पर रायसेन के किले के समीप हुआ, तो किले वालों ने बहुमूल्य उपहार सहित प्रार्थना पत्र प्रेषित कर निवेदन किया कि - "किला बादशाह का है और हम उनके सेवक हैं।" इस प्रकार रायसेन पर बिना किसी कठिनाई के ही नियंत्रण स्थापित हो गया।
तत्पश्चात् हुमायूँ व्यर्थ समय व्यतीत नहीं करते हुए, सारंगपुर पहुँचा जो कि आगरा-मुम्बई मार्ग पर इन्दौर से 74 मील दूर 23° 34' उत्तर तथा 76° 29' पूर्व में स्थित है। इस प्रकार हुमायूँ बिना किसी अवरोध के मालवा के मध्य में पहुँच गया।
हुमायूँ के इस कार्य से बहादुरशाह बहुत घबराया। बहादुरशाह आगरा की तैयारियों को यह मानकर चल रहा था कि यह सब बंगाल के विद्रोह को दबाने के लिये की जा रही है, इसी मनः स्थिति के कारण वह चित्तौड़ के घेरे (1534 ) में व्यस्त था। जब उसे हुमायूँ के आगमन की सूचना प्राप्त हुई, वह सचेत हुआ क्योंकि आरक्षित गुजरात पर हुमायूँ का आक्रमण हानिकारक हो सकता था, अतः गुजरात की रक्षा के लिये उसने चित्तौड़ के घेरे को त्याग कर तब राजधानी माण्डू को लौटकर हुमायूँ के आक्रमण से अपने क्षेत्र की रक्षा करने का विचार किया ।
बहादुरशाह ने अपने मंत्रियों व सेवकों से परामर्श किया, उसके मंत्रियों में प्रमुख अमीर सद्रखान जो कि अपनी बुद्धिमत्ता व उच्च परामर्श के लिये प्रसिद्ध था, ने उसे एक कूटनीतिक सलाह दी कि - हुमायूँ मुसलमान होने के कारण हम पर आक्रमण नहीं करेगा, क्योंकि हम "गजा " ( धर्मयुद्ध) में लगे हुए हैं, और हुमायूँ का हम पर आक्रमण धर्म के विरुद्ध होगा, तथा चित्तौड़ का घेरा भी अपनी अंतिम अवस्था में है, जिससे चित्तौड़ विजय में अधिक समय नहीं लगेगा ।
अतः इस कूटनीतिक अस्त्र का प्रयोग करते हुए बहादुरशाह ने हुमायूँ को पत्र लिखा कि- "जब तक वह धर्म युद्ध में लगा है, उस पर आक्रमण नहीं किया जाये।" हुमायूँ ने इसे स्वीकार किया और चित्तौड़ के पतन तक वह सारंगपुर में ही रुका रहा।
जब चित्तौड़ विजय लगभग पूर्ण होने ही वाली थी, तब हुमायूँ उज्जैन में था, और बहादुरशाह चित्तौड़ से सीधा गुजरात जाने के प्रयास में था, किन्तु चित्तौड़ के पतन की खबर पाकर, हुमायूँ उज्जैन से चलकर मन्दसौर आ पहुँचा और बहादुरशाह भागने में सफल नहीं हो पाया । मन्दसौर में बादशाह हुमायूँ एवं बहादुरशाह दोनों की सेनाएँ आमने-सामने एक झील के निकट खड़ी रही । मुगलों के अग्रणी दस्ते ने बहादुरशाह की गुजराती सेना में गड़बड़ी उत्पन्न कर दी, किन्तु उसका कुछ विशेष प्रभाव नहीं पड़ा । रणनीति के विषय में बहादुरशाह के सेनानायकों में मतभेद था। ताजखान व सद्रखान का मत था कि सेना में चित्तौड़ विजय से उत्साह व उच्च मनोबल है, अतः तुरंत ही आक्रमण कर देना चाहिये, सेना पूर्ण उत्साह से आक्रमण करेगी, किन्तु रूमी खाँ ने इसका विरोध किया और कहा कि हमारे पास बहुत बड़ा तोपखाना है। खुली लड़ाई में तोपखाने का उपयोग कठिन है, आग की वर्षा की इतनी बड़ी व्यवस्था होते हुए भी तलवारों व तीरों से युद्ध करना मूर्खता है, अतः उचित होगा कि हम अपने चारों ओर अराबों (गाड़ियों) का घेरा तैयार कर लें, और चारों तरफ गहरी खाई खुदवा दें, ताकि मुगल सेना इसके निकट आते ही बंदूकों व तोपों से मार डाली जायेगी। सर्वप्रथम उन अस्त्रों का उपयोग करें जो दूर से हानि पहुँचाने में सक्षम हैं, ताकि शत्रु सेना की संख्या में निरंतर कम होती जाये।
बहादुरशाह ने रूमी खाँ की सलाह को माना क्योंकि, सद्रखान की योजना आक्रमण की थी, किन्तु रूमी खाँ की योजना में आक्रमण व प्रतिरक्षा दोनों थी । रूमी खाँ तोपखाने का विशेषज्ञ था, चित्तौड़ विजय का कुछ श्रेय उसी को जाता था, जिससे उसकी योग्यता का सिक्का भी जम गया था। बहादुरशाह की स्वीकृति पाते ही रूमी खाँ ने सुरक्षा प्रबंध करना प्रारंभ कर दिया, अपनी सेना के चारों ओर गाड़ियों तथा आरक्षित तोपों से उसने एक रक्षान्त दीवार बना दी, एक ओर झील व तीन ओर खाइयों से सुरक्षित भी कर लिया। बहादुरशाह व उसकी सेना इस घेरे के अंदर थी, आक्रमणकारी दल एवं घुड़सवार दल भी था। इनका लक्ष्य मुगल- सेना को तंग करना, तथा ऐसी परिस्थितियों का निर्माण करना था, जिससे मुगल सेना तोपों के सम्मुख आ जाये और उन्हें मार डाला जाये। यह योजना बाबर की योजना से काफी मिलती जुलती थी, जो उसने पानीपत युद्ध में अपनायी थी ।
बहादुरशाह ने पानीपत के युद्ध में मुगलों की युद्धशैली को देखा था, वह उससे प्रभावित था, इस कारण रूमी खाँ की योजना पर उसे विश्वास था । प्रारंभ में रूमी खाँ को सफलता मिली। प्रारंभिक मुठभेड़ों में मुगलों को हानि उठानी पड़ी। 14 अप्रैल, सन् 1535 ईस्वी को मुहम्मद जमान मिर्जा ने 500 घुड़सवारों के साथ आक्रमण किया, बहुत से मुगल सैनिक उसका पीछा करते हुए, गुजराती सेना की तोपों के सामने आ गये और मारे गये। मुगल सैनिक तोपों के निकट जाने में डरते थे ।
हुमायूँ, बहादुरशाह की सेना को घेरे रहा, उसने दो एक बार गुजराती सेना की इस पंक्ति को नष्ट करने का प्रयत्न किया, किन्तु उसे पीछे लौटना पड़ा। हुमायूँ ने अब यह निश्चय किया कि गुजराती सेना को इस तरह घेर लिया जाये कि उसे बाहर से सामग्री प्राप्त नहीं हो सके । इस प्रकार बहादुरशाह की सुरक्षा नीति से मुगल सेना को उसकी घेराबंदी का अवसर प्राप्त हुआ, व गुजराती सेना अपनी ही नीति से संकट में पड़ गई। उसने उन सभी मार्गों को अपने अधिकार में कर लिया जिससे कि गुजराती सेना को आवश्यक सामग्री प्राप्त न हो सके। इसके अतिरिक्त उसने अपने सैनिकों को आज्ञा दी कि गुजराती सेना के पास नहीं जाएँ ।
इस योजना से हुमायूँ को सफलता मिली, गुजराती सेना को रसद, घोड़ों का चारा, ईंधन इत्यादि के मिलने में कठिनाई होने लगी, जिससे बहादुरशाह के पड़ाव में बहुत परेशानी हुई, अन्न का भाव बहुत बढ़ गया। बहादुरशाह ने बंजारों की सहायता से दस हजार अनाज से लदी बैलगाड़ियों को प्राप्त किया, व उन्हें लाने के लिये 5000 सैनिक भेजे, किन्तु दुर्भाग्यवश ये सूचना हुमायूँ तक पहुँच गयी, और समस्त रसद सेना की सहायता से मुगलों ने अपने अधिकार में कर लिया, इससे गुजराती सेना को बहुत निराशा हुई तथा उनका कष्ट बहुत बढ़ गया ।
इस स्थिति में बहुत दिन तक रहना संभव नहीं था, अतः बहादुरशाह ने अपने शिविर से पलायन करने का निश्चय किया। उसके दो अमीर सैयद अलीखान और खुरासान खान दोनों ने युद्ध के प्रारंभ में ही उससे विश्वासघात किया था, और अब उसे रूमी खाँ के विश्वासघात की जानकारी प्राप्त हुई । तुर्की मुस्तफा रूमी खाँ चित्तौड़ की किलेदारी नहीं मिलने के कारण बहादुरशाह से असंतुष्ट होकर हुमायूँ से गुप्त रूपेण बहादुरशाह के विरुद्ध सांठगांठ करता था.
सन् 1535 ईस्वी की रात को बहादुरशाह ने मतलू खान और मोहम्मदशाह आदि पाँच विश्वसनीय अमीरों के साथ शिविर छोड़ा। पहले वह उत्तर में की ओर गया, किन्तु फिर मुड़कर उसने माण्डू की ओर कूच किया।
पलायन से पहले बहादुरशाह ने अपनी संपत्ति, जवाहरात, तोपखाना तथा जानवरों को नष्ट करवा दिया, जिससे कि वे शत्रु के हाथों में नहीं पड़े। जिस समय बहादुरशाह के प्रिय हाथियों "शिरजा" तथा "पतसिंगार" की सूंडें काटी जा रहीं थी, और उसकी प्रसिद्ध तोपें "लैला, मजनूँ" को नष्ट किया जा रहा था, तो उसकी आँखों में आँसू आ गये थे। तत्पश्चात् वह पिछले रास्ते के एक सुनसान मार्ग से माण्डू रवाना हो गया।
अगली सुबह के साथ हुमायूँ ने बहादुरशाह के शिविर पर कब्जा कर लिया। इस प्रकार मन्दसौर के युद्ध की समाप्ति बहादुरशाह की हार व पलायन के साथ हुई। बहादुरशाह के अचानक भाग जाने से गुजराती सेना निराश हो गई, उनके सामने न भागने का रास्ता था, न ही वे वहाँ रुक सकते थे, फिर भी जिसको जहाँ अवसर मिला भाग निकला। सद्रखान व इमादुलमुल्क ने विपरीत परिस्थितियों के होते हुए बुद्धि तथा साहस से काम लिया, जो सेना एकत्रित हो सकती, एकत्रित की तथा प्रातः काल अपने झंडे उड़ाते हुए और बाजे बजाते हुए, जैसे पराजित न होकर विजयी हों, माण्डू की ओर निकल गये तथा अपनी सेना सहित माण्डू में बहादुरशाह से जा मिले। इधर हुमायूँ ने यादगार नासिर मिर्जा, कासिम हुसैन सुल्तान तथा हिन्दू बेग के नेतृत्व में एक सेना गुजराती सेना का पीछा करने के लिये भेजी। सद्रखान व इमादुलमुल्क को तो वे न पकड़ पाये किन्तु 80 वर्ष के बूढ़े खुदाबन्द खाँ को जो बुढ़ापे व अस्वस्थता के कारण पालकी में बैठकर माण्डू की ओर जा रहा था पकड़ लिया.
मुहम्मद जमान मिर्जा जो अब तक बहादुरशाह के साथ था, यहाँ से भागकर पंजाब तथा थट्टा की ओर चला गया। कामरान की अनुपस्थिति का लाभ उठाकर उसने पंजाब में लूटमार करनी प्रारंभ कर दी। बहादुरशाह की इन प्रतिकूल परिस्थितियों का राजपूतों ने भी लाभ उठाया व चित्तौड़ पर पुनः अधिकार कर लिया।
दूसरी ओर हुमायूँ ने भी गुजराती सेना का पीछा किया, किन्तु उन पर आक्रमण नहीं किया तथा माण्डू के निकट पहुँचकर नालछा में जो माण्डू के दिल्ली दरवाजे से मात्र 4.83 कि.मी. दूर था, अपना पड़ाव डाला।
संधि :
माण्डू का दुर्ग मध्य युग के शक्तिशाली दुगों में समझा जाता था, वह 37 कि.मी. की परिधि में फैला हुआ था, तथा चारों ओर से मोचों वाली दीवारों (परकोटे) से रक्षित था। मन्दसौर से भागकर बहादुरशाह ने यहीं पर मुगलों का सामना करने का निश्चय किया। रूमीखान तथा अन्य सेनानायकों के विश्वासघात से बहादुरशाह दहला हुआ था, तथा हुमायूँ जानता था कि माण्डू का दुर्ग इतना शक्तिशाली है कि उसे आसानी से अधिकार में नहीं लाया जा सकता इसके अतिरिक्त पूर्व में शेरखान की गतिविधियों पर भी उसका ध्यान था । माण्डू के घेरे में अधिक समय लगने से पूर्व में खतरा उपस्थित होने का भय था, वर्षा ऋतु भी आ रही थी, जिससे अन्य जटिलताएँ बढ़ जाने की आशंका थी। इन सभी कारणों पर विचार कर हुमायूँ ने बहादुरशाह से संधिवार्ता करना उचित समझा तथा बहादुरशाह ने भी इसे स्वीकार किया।
हुमायूँ ने सैयद अमीर तथा बैरम खाँ को बहादुरशाह के पास दूत बनाकर यह संदेश भेजा कि वर्षा ऋतु में युद्ध करना ठीक नहीं है। हुमायूँ ने प्रस्ताव रखा कि गुजरात का वह भाग जो . बहादुरशाह को उसके पूर्वजों से प्राप्त हुआ था। उस पर उसका अधिकार रहे तथा मालवा व अन्य भागों पर मुगलों का अधिकार हो जाए। हुमायूँ ने यह स्वीकार किया कि उसके प्रस्ताव का कारण खुले युद्ध की कठिनाइयाँ थीं। इस तरह दोनों पक्षों में संधिवार्ता प्रारंभ हुई। बहादुरशाह ने भी संधिवार्ता का स्वागत किया, हुमायूँ का प्रतिनिधि मौलाना फरगली तथा बहादुरशाह का प्रतिनिधि सद्र खां नालछा और माण्डू के बीच नीली सबील पर मिले। गुजरात की तरफ से सरदारों को सहायता देने के लिए दो शिष्ट मौलवियों को भाग लेने की स्वीकृति हुमायूँ ने दे दी । अन्त में मौलवियों की मध्यस्थता से संधि की शर्तें तय हो गयी, जिसके अनुसार चित्तौड़, गुजरात तथा माण्डू और उसके निकट के भाग मुगलों को प्राप्त होंगे। मुगल सम्राट ने इसे स्वीकार कर लिया, क्योंकि वह माण्डू पर तुरंत अधिकार चाहता था। एक व्यक्तिगत पत्र में हुमायूँ ने संधि को स्वीकृति दे दी। यह निश्चय हुआ कि बहादुरशाह माण्डू दुर्ग के पश्चिमी द्वार अर्थात् लोहानी दरवाजा से बाहर निकल जाए, तथा मुगल उत्तरी द्वार अर्थात दिल्ली दरवाजा से प्रवेश करे।
उसी रात लगभग दो सौ मुगल सैनिक माण्डू की दीवार पर सीढ़ियाँ लगाकर तथा फंदेदार रस्सी की सहायता से दुर्ग में प्रवेश कर गये। उन्होंने दुर्ग का फाटक खोल दिया, तथा अन्य मुगल सैनिकों की सहायता से दुर्ग पर अधिकार कर लिया। इसकी सूचना पाते ही हुमायूँ पर चढ़कर अपने के साथ दुर्ग में प्रवेश गया। सद्र खां अपने आदमियों सहित अपने घर के द्वार पर खड़ा युद्ध करता रहा, तथा घायल होने पर भी अपने स्थान पर दृढ़ रहा। अंत में उसके पदाधिकारी उसके घोड़े की लगाम पकड़कर माण्डू दुर्ग के अंदर सोनगढ़ (सुगढ़) की ओर ले गये। जिसकी रक्षा का उत्तरदायित्व सुलतान आलम खाँ के ऊपर था । कादिरशाह, जिस पर दुर्ग की रक्षा का उत्तरदायित्व था, मुगलों के प्रवेश की सूचना पाकर दुर्ग के बुर्ज से उतरकर घोड़ा दौड़ाता हुआ, बहादुरशाह के शयनागार में पहुँचा । बहादुरशाह के सेवक उसे अन्दर आने देने को राजी नहीं हुए परन्तु उसकी आवाज सुनकर बहादुरशाह बाहर आया तथा उसकी आवाज पहचानकर उसने उसे अन्दर बुलाया। परिस्थिति जानकर बहादुरशाह घोड़े पर चढ़कर बाहर निकला, उसके साथ कादिरशाह और भूपतराय भी थे। रूमी खाँ ने भूपतराय को बहादुरशाह का साथ छोड़ने के लिए भड़काया था और उनसे हुमायूँ द्वारा सद्व्यवहार का आश्वासन दिया था। भूपतराय ने फिर भी बहादुरशाह का साथ न छोड़ा।
प्रारंभ में बहादुरशाह ने युद्ध करना चाहा, परन्तु सोनगढ़ पहुँचने पर उसने अनुभव किया कि स्थिति प्रतिकूल है, अतः उसने माण्डू से भागने का निश्चय किया। रात के गहन अंधकार में उसके घोड़े रस्सियों से बांधकर दुर्ग की दीवारों से बाहर निकाले गए और बहादुरशाह कुछ साथियों के साथ वहाँ से निकल गया, भागते-भागते मुगल सेना के ऊजबेग सैनिक बुरी ने बहादुरशाह को पहचान लिया। इस सैनिक ने इसकी सूचना अपने सेना नायक कासिम हुसैन को दी, किन्तु उसने यह कहकर टाल दिया कि गुजरात का सुल्तान केवल तीन-चार सिपाहियों के साथ नहीं जाएगा। इस प्रकार भाग्य ने बहादुरशाह के पलायन में साथ दिया ।
माण्डू के दुर्ग पर अधिकार करने के पश्चात मंगलवार का दिन होने से हुमायूँ ने लाल वस्त्र पहना था, उसने कत्लेआम की घोषणा की। तीन दिन तक मुगल सैनिक माण्डू की गलियों में खून की नदियाँ बहाते रहे। अंत में चौथे दिन वच्छू (मंझू ) नामक बहादुरशाह के एक गुजराती गायक के गाने से प्रभावित होकर हुमायूँ ने हरा वस्त्र पहना व कत्लेआम बंद करने की आज्ञा कत्लेआम के कारण माण्डू में शांति स्थापित करने में कठिनाई नहीं हुई । सद्र खाँ घायल अवस्था में हुमायूँ के सामने लाया गया, हुमायूँ ने उसे क्षमा कर दिया। अन्य अमीरों के साथ अच्छा बर्ताव किया गया। सद्र खाँ हुमायूँ की सेवा में आया तो प्रारंभ में उसके ऊपर केवल निगरानी रखी गई। उसने यह आश्वासन दिया कि वह मुगल क्षेत्र छोड़कर कहीं नहीं जाएगा। बहादुरशाह की सेना पूरी तरह नष्ट हो गयी और बाद में अहमदाबाद भी हुमायूँ के नियंत्रण में आ गया। अहमदाबाद के नियंत्रण के बाद गुजरात की द्वितीय चरण की लड़ाई भी खत्म हो गयी।
यूँ ने अस्करी को अहमदाबाद का गवर्नर बनाया और अन्य प्रशासनिक व्यवस्था की । इस व्यवस्था के बाद हुमायूँ मालवा की ओर लौटा, यहाँ भी उसको प्रशासनिक व्यवस्थाएँ करनी थीं, क्योंकि माण्डू में हुए अत्याचार से यहाँ की जनता विमुख हो गयी थी। वह वहाँ इस आशा के साथ पहुँचा कि वह पूर्व में की गयी गलतियों को सुधारेगा, वहाँ पहुँचकर उसने देखा कि प्रदेश में असंतोष व अव्यवस्था व्याप्त है। मालवा के तीन प्रमुख सरदार माण्डू का मालू खाँ जो बहादुरशाह का विश्वसनीय था, एवं सतवास का सिकन्दर और हण्डिया का मेहतार जाम्बुर ये तीनों उज्जैन के दरवेश अली किताबदार के नेतृत्व में मुगल सैनिक टुकड़ी पर आक्रमण करना चाहते थे। परन्तु सैनिक टुकड़ी का सरदार मारा गया और जो बचे वह मुगल सम्राट की आती हुई सेना की तरफ चले गये। अब हुमायूँ का पहला कार्य मालवा के हारे हुए क्षेत्रों को नियंत्रण में करना था। इसलिए उसने माण्डू को अपना मुख्य निवास स्थान बनाया इसका परिणाम यह हुआ कि मल्लू खाँ और दो अन्य विद्रोही सरदारों का प्रभाव बादशाह के माण्डू में ठहरने से कम हो गया।
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