राजनीति में सत्ता एवं सत्ता पालन के आधार |Authority, Legitimacy and Influence in politics

 

राजनीति में सत्तावैधता और प्रभाव

(Authority, Legitimacy and Influence)

राजनीति में सत्ता एवं  सत्ता पालन के आधार |Authority, Legitimacy and Influence in politics


 

 

सत्ता शक्ति के प्रयोग का संस्थात्मक अधिकार हैवह स्वयं शक्ति नहीं है। " -बायर्सटेड

 

राजनीति में सत्ता की भूमिका 

सत्ता को राज व्यवस्था रूपी 'शरीर की आत्माकहा जा सकता है। यह शक्ति प्रभाव और नेतृत्व का मूल उपकरण हैं और नीति निमार्णसमन्वयअनुशासन और प्रत्यायोजन (delegation) आदि राजनीतिक प्रक्रियाएँ सत्ता के आधार पर ही सम्भव होती हैं। औपचारिक एवं अनौपचारिक दोनों ही प्रकार के संगठनों में सत्ता को महत्त्वपूर्ण स्थिति प्राप्त होती है और राजनीतिक जीवन में सत्ता की अवहेलना नहीं की जा सकती। कोई व्यक्ति या व्यक्ति समूह बिना औपचारिक सत्ता के होते हुए भी एक विशेष परिस्थिति में सत्ता धारण किये रह सकता है। लोकतन्त्र में सत्ता का अधीनस्थों अर्थात् जनता के द्वारा स्वीकृत किया जाना महत्त्वपूर्ण होता है। राज व्यवस्थाओं एवं राजनीति में सत्ता की मात्रा को बढ़ाना आवश्यक तथा महत्त्वपूर्ण होता हैराजनीतिक लक्ष्यों की सिद्धि इसी से सम्बन्धित होती है और बहुत अधिक सीमा तक इसी पर निर्भर करती है।

 

सत्ता की अवधारणा अर्थ एवं व्याख्या

 

समाज विज्ञानों के अन्तर्राष्ट्रीय ज्ञान कोश के अनुसार सत्ता को कई प्रकार से परिभाषित किया जा सकता है। सत्ता की अनेक व्याख्याएँ की गयी हैंकिन्तु अपने सभी रूपों में सत्ता शक्तिप्रभाव एवं नेतृत्व से जुड़ी हुई है। सत्ता की कुछ परिभाषाएँ इस प्रकार हैं:

 

बायर्सटेड 'सत्ता शक्ति के प्रयोग का संस्थात्मक अधिकार हैवह स्वयं शक्ति नहीं है। "


बीच (Beach ) के अनुसारदूसरों के कार्य निष्पादन को प्रभावित या निर्देशित करने का औचित्यपूर्ण अधिकार सत्ता है। "

 

हेनरी केयोल के अनुसार, "सत्ता आदेश देने का अधिकार और आदेश का पालन करवाने की शक्ति है। " 


ऐलन के अनुसार, “सौंपे गये कार्यों के निष्पादन को सम्भव बनाने हेतु प्रदान की गई शक्तियाँ एवं अधिकार सत्ता कहलाते हैं। "

 

थियो हैमेन ने सत्ता की परिभाषाएँ कुछ अधिक स्पष्टता के साथ दी हैं। उनके अनुसार,


 “सत्ता वह वैधानिक शक्ति है जिसके आधार पर अधीनस्थों को काम करने के लिए कहा जाता है तथा उन्हें बाध्य किया जा सकता है और आदेश के उल्लंघन पर आवश्यकतानुसार प्रबन्धक उनके विरुद्ध अनुशासनात्मक कार्यवाही कर सकता है। यहाँ तक कि उनको कार्य से भी पृथक् कर सकता है।"

 

उपर्युक्त सभी विद्वानों ने सत्ता को निर्णय लेनेआदेश देने और आदेश का पालन कराने वाली उच्च स्तरीय शक्ति के रूप में परिभाषित किया है। इन सभी परिभाषाओं में सत्ता के औपचारिक पक्ष को या मात्र कानूनी पक्ष को ही दृष्टि में रखा गया है तथा इस प्रकार ये परिभाषाएँ सत्ता के केवल एक ही पक्ष को स्पष्ट करती हैं। सत्ता आदेश देनी वाली उच्चस्तरीय शक्ति हैलेकिन केवल इस स्थिति के कारण ही सत्ताधारी के आदेशों का पालन नहीं होता है। आदेशों के पालन का एक आधार अधीनस्थ अथवा जिन्हें निर्देश दिए जाते हैंउनकी सहमति होता है। अधीनस्थ जब इस बात को स्वीकार करते हैं कि आदेशों के स्रोत सही या उचित हैतब ही आदेश देने वाले अधिकारी को 'प्राधिकारी' (सत्ताधारी) कहा जाता है। सत्ता शक्ति के समान 'शास्तियों' (Sanctions) के आधार पर नहीं अपितु उचित होने के कारण दूसरों के व्यवहार को अपने अनुकूल बनाकर प्रभावित करने का साधन है। यूनेस्को की एक रिपोर्ट के अनुसार, “सत्ता वह शक्ति है जो कि स्वीकृतसम्मानितज्ञात एवं औचित्यपूर्ण हो । 

 

मेरी पार्कर फॉलेटचेस्टर बर्नार्ड और साइमन आदि के विद्वान जिनके द्वारा व्यावहारिक और मनोवैज्ञानिक पक्ष को दृष्टि में रखते हुए सत्ता की व्याख्या की गई है, वे सत्ता के प्रसंग में औचित्य तथा अधीनस्थों की सहमति को अधिक महत्त्व देते हैं। इन विद्वानों के अनुसार सत्ता आदेश देने वाली उच्च स्तरीय शक्ति और आदेशों का पालन करने वाले अधीनस्थों के बीच सहमति पर आधारित सम्बन्धों को जन्म देती है। 

इस दृष्टि से साइमन की परिभाषा अधिक महत्त्वपूर्ण है। उसके अनुसार,

 “अधिकार सत्तानिर्णय लेने एवं अन्य व्यक्तियों की क्रियाओं को मार्गदर्शित करने की शक्ति है। यह दो व्यक्तियों के बीच उच्चाधिकारी एवं अधीनस्थ का सम्बन्ध है। उच्चाधिकारी निर्णय लेता है और आशा करता है कि अधीनस्थ द्वारा उसका पालन किया जाएगा। अधीनस्थ ऐसे ही निर्णयों की आशा करते हैं और उनके व्यवहार इन निर्णयों से निर्धारित होते हैं।"

 

इस प्रकार सत्ता के दो पक्ष हैं: प्रथमनिर्णय लेने और आदेश देने वाली उच्च शक्ति तथा द्वितीयउच्च शक्ति को प्राप्त अधीनस्थों की सहमति। इन दोनों तत्वों को दृष्टि में रखते हुए अपने शब्दों में सत्ता को इस प्रकार परिभाषित किया जा सकता है: " अधिकार-सत्तानिर्णय लेनेआदेश देने तथा उनका पालन करवाने की वह शक्तिस्थिति या अधिकार हैजिसे अधीनस्थों द्वारा स्वीकार कर लिया गया है और संगठनात्मक लक्ष्यों की पूर्ति के लिए अधीनस्थों द्वारा जिसका पालन आवश्यक होता है। "

 

सत्ता की प्रकृति (The Nature of Authority)

 

सत्ता की प्रकृति के सम्बन्ध में विचार भेद हैं और इस सम्बन्ध में प्रमुख रूप से दो सिद्धान्तों का प्रतिपादन किया गया है। ये दोनों ही सिद्धान्त प्रो. बीच (Beach) द्वारा प्रतिपादित किये गये हैं जो निम्न प्रकार हैं: 

1. औपचारिक सत्ता सिद्धान्त (Formal Theory) - 

इस सिद्धान्त के अनुसार सत्ता को आदेश देने का अधिकार माना जाता है और सत्ता का प्रवाह ऊपर से नीचे की ओर चलता है। यह अधिकार व्यवस्थाओं एवं संगठनों में विशिष्ट एवं वरिष्ठ अधिकारियों को दिया जाता है और इससे आदेश या सत्ता का पदक्रम बन जाता है। 

सत्ता के पीछे व्यवस्था या संगठन की औचित्यपूर्ण शक्ति होती है। इस शक्ति के कारण उसे स्वीकार किया जाता है। सत्ता आवश्यक रूप से सत्ताधारी की व्यक्तिगत श्रेष्ठता को नहीं बतलाती। सत्ताधारी तो व्यवस्था या संगठन में अन्तर्निहित शक्ति का कार्यशील प्रतीक मात्र है। मैकाइवर ने इसे 'शासन का जादूकहा है कि एक व्यक्ति जो आदेश देता हैवह भले ही अपने अधीनस्थों से अधिक बुद्धिमान न होअधिक योग्य न हो और किसी भी दृष्टि से अपने सामान्य साथियों से श्रेष्ठ न होकभी-कभी तो उसका स्तर इन सबसे हीन भी हो सकता हैलेकिन वह सत्ता की स्थिति में होने के कारण आदेश निर्देश देता है और उसके आदेशों का पालन किया जाता है।

 

2. स्वीकृति सिद्धान्त (Acceptance Theory) - 

व्यवहारवादी या मानव सम्बन्धवादी औपचारिक सत्ता सिद्धान्त में विश्वास न रखते हुए 'स्वीकृति सिद्धान्तका प्रतिपादन करते हैं। इन यथार्थवादी अध्ययनकर्ताओं के अनुसारसत्ता कानूनी रूप से तो केवल औपचारिक होती हैकिन्तु वास्तव में सत्ता या आदेश के अधिकार की सफलता अधीनस्थ की स्वीकृति पर निर्भर करती है। जब अधीनस्थ अपनी समझ और योग्यता के दायरे में आदेशों को स्वीकार कर लेते हैं तो यह स्थिति 'सत्ता स्थितिबन जाती है। बर्नार्ड अपनी रचना 'The Functions of the Executive' में लिखते हैं कि अधीनस्थ आदेशों को स्वीकार करेंइसके लिए चार शर्तें पूरी होनी आवश्यक हैं: (i) अधीनस्थ अधिकारी आदेश अथवा सूचना को समझता या समझ सकता हो, (ii) अपने निश्चय करने के समय उसका यह विश्वास हो कि आदेश संगठन के उद्देश्यों के साथ असंगत नहीं है, (iii) निर्णय लेने के समय में वह यह सोचता हो कि एक समग्रता के रूप में सम्बन्धित आदेश उसके व्यक्तिगत हितों के अनुकूल है तथा (iv) वह मानसिक और शारीरिक दृष्टि से उस आदेश के अनुपालन की क्षमता रखता हो।

 

वस्तुतः सत्ता की प्रकृति के सम्बन्ध में प्रतिपादित इन दोनों ही सिद्धान्तों की अपनी दुर्बलताएँ हैं और इन्हें अतिवादी कहा जा सकता है। इन दोनों सिद्धान्तों की सत्यताओं को ग्रहण करते हुए एक सन्तुलित दृष्टिकोण का विकास हुआ हैजिसके अन्तर्गत सत्ता की अवधारणा में संस्थाकृत औचित्यपूर्ण शक्ति और अधीनस्थों की स्वीकृति दोनों को महत्त्वपूर्ण स्थान प्रदान किया गया है। यही उचित दृष्टिकोण है और राजनीति विज्ञान में सामान्यतया इसी को अपनाया गया है।

 

सत्ता के स्रोत या सत्ता के प्रकार 

सत्ता की अवधारणा की विवेचना सुकरातप्लेटोऑगस्टाइन आदि के समय से होती रही हैकिन्तु इसकी विस्तृत विवेचना बीसवीं सदी में राजनीतिक और समाजशास्त्रीय विश्लेषक मैक्स वेबर द्वारा प्रस्तुत की गयी है। सत्ता एवं औचित्यपूर्णता का परस्पर घनिष्ठ सम्बन्ध है और मैक्स वेबर ने इस सम्बन्ध को दृष्टि में रखते हुए औचित्यपूर्ण के आधार पर सत्ता के स्रोतों एवं प्रकारों का वर्णन किया है। उसके अनुसार अपने स्रोत के आधार पर सत्ता तीन प्रकार की होती है:

 

1. परम्परागत (Traditional) - 

जब प्रजा या अधीनस्थ वरिष्ठ अधिकारियों के आदेशों को इस आधार पर स्वीकार करते हैं कि ऐसा सदैव से होता आया हैतो सत्ता का यह प्रकार परम्परागत कहा जायगा। इस प्रकार परम्परागत सत्ता का अभिप्राय शासन के उस अधिकार से है जो राजनीतिक शक्ति से अनवरत प्रयोग से उभरता है। इस प्रकार की सत्ता में 'प्रत्यायोजन' (delegation) मात्र अस्थायी रूप से किया जाता और पूर्ण रूप से सर्वोच्च सत्ताधारी की इच्छा पर निर्भर करता है। अधीनस्थ सेवक समझे जाते हैं और वे आज्ञापालन परम्पराओं के प्रतीक विशेष व्यक्ति के कारण करते हैंजैसेराजतन्त्र में राजा ।

 

2. बौद्धिक कानूनी या वैधानिक नौकरशाही सत्ता (Rational Legal or Legal Bureaucratic Authority) - 

जब अधीनस्थ किसी नियम को इस आधार पर स्वीकार करते हैं कि वह नियम उन उच्चस्तरीय अमूर्त नियमों के सम्मत है जिसे वे औचित्यपूर्ण समझते हैंतब इस स्थिति में सत्ता को बौद्धिक कानूनी माना जाता है। यह सत्ता संवैधानिक नियमों के अन्तर्गत धारण किये गये पद से प्राप्त होती है। अमेरिका में जब राष्ट्रपति पद का कोई उम्मीदवार निर्वाचक मण्डल का बहुमत प्राप्त कर लेता है अथवा जब भारत में लोकसभा के बहुमत सदस्य किसी को भी अपना नेता निर्वाचित कर उसे प्रधानमन्त्री पद पर प्रतिष्ठित कर देते हैंतब यह सत्ता का बौद्धिक तार्किक आधार ही होता है। इसमें सत्ता का प्रत्यायोजन बौद्धिक आधार पर किया जाता है और कर्मचारीगण वैधानिक रूप से स्थापित निर्वैयक्तिक आदेशों के आधार पर आज्ञापालन करते हैं। सत्ता का यह रूप आधुनिक नौकरशाही को अपने विशुद्ध रूप में प्रकट करता है।

 

3. करिश्मात्मक सत्ता (Charismatic Authority) -

 जब अधीनस्थ वरिष्ठ सत्ताधारी के आदेशों को इस आधार पर न्यायसंगत मानते हैं कि उन पर सत्ताधारी का व्यक्तिगत प्रभाव हैतब इसे करिश्मात्मक सत्ता कहते हैं। इस सत्ता की स्थिति में प्राय: कोई प्रत्यायोजन नहीं होता और अधीनस्थ कर्मचारी सत्ताधारी के व्यक्तिगत सेवक के रूप में आचरण करते हैं। अधीनस्थ अनुयायी होते हैं और अपने प्रिय नेता के करिश्माती एवं आदर्शवादी व्यक्तित्त्व के कारण उसके आदेशों का पालन करते हैं। स्पष्टतया मैक्स वेबर केवल औचित्यपूर्ण सत्ता का विश्लेषण प्रस्तुत करता है। मैक्स वेबर बतलाता है कि बौद्धिक कानूनी सत्ता कमजोर एवं भंजनशील होती हैअतः उसे सबलता प्रदान करने के लिए उसमें परम्परागत एवं करिश्माती तत्वों को शामिल किया जाना चाहिए।

 

राजनीति में सत्ता, वैधता और प्रभाव|Authority, Legitimacy and Influence in politics

संस्थात्मक शक्ति की दृष्टि से सत्ता का विभिन्न प्रकार से प्रयोग किया जाता है और इस सत्ता के आधार पर व्यापक सन्दर्भ में सत्ता के और भी प्रकार हो सकते हैं: (i) क्षेत्रीयता की दृष्टि से राष्ट्रीयप्रान्तीय और स्थानीय (ii) अपेक्षाकृत व्यापक सन्दर्भ की दृष्टि से राष्ट्रीय एवं अन्तर्राष्ट्रीय (GIL) संवैधानिक दृष्टि से संविधान से प्राप्त अथवा साधारण कानूनों से प्राप्त, (iv) सरकार के परम्परागत अंगों के आधार पर कार्यपालिका व्यवस्थापिका एवं न्यायपालिका सम्बन्धी (1) राजनीतिक दृष्टि से राजनीतिक तथा प्रशासनिक, (vi) विभिन्न विषयों की दृष्टि से सत्ता आर्थिकसामाजिकधार्मिकतकनीकी आदि हो सकती है।

 

सत्ता के ये विभिन्न रूप सत्ता प्रयोग की दृष्टि से ही बतलाये जा सकते हैं और सत्ता के इन तथाकथित रूपों में परस्पर कोई मूल अन्तर नहीं है।

 

सत्ता के आधार 

सत्ता एक ऐसा स्वतन्त्र परिवर्त्य है जिसका शक्तिप्रभाव आदि से घनिष्ठ सम्बन्ध होता है। सत्ता के अनेक स्रोत एवं आधार होते हैं। सत्ता का मूल आधार तो औचित्यपूर्णता ही है क्योंकि सत्ता के आदेशों का पालन सत्ताधारी और अधीनस्थ के बीच मूल्यों की समानता के आधार पर किया जाता है। इसके अतिरिक्त विश्वासविचारों की एकरूपताविभिन्न दण्ड विधान अधीनस्थों की प्रकृतिपर्यावरणात्मक दबाव आदि भी सत्ता के आधार रूप में कार्य करते हैं। पर्यावरणात्मक दबाव आन्तरिक और बाहरी दोनों ही रूपों में होते हैं। राज व्यवस्थाओं में आन्तरिक दबाव आन्तरिक राजनीतिक संरचनाओं जैसे संविधानप्रशासनिक संगठन पदानुक्रम में आयोजित विभिन्न पदों तथा इन . पदाधिकारियों के अधिकार तथा शक्तियों के रूप में होते हैं। इसके अतिरिक्त सत्ताधारी की कार्यकुशलता और वैयक्तिक गुण भी सत्ता के आधार के रूप में कार्य करते हैं। अपने राज्य का भलीभाँति अस्तित्व बनाये रखने की इच्छाबाहरी दबाव के रूप में सत्ता के आधार का कार्य करती है।

 

सत्ता को स्वीकार करने के लिए अधीनस्थ के पास एक 'तटस्थता का क्षेत्र' (Zone of indifference) होता है जिसके अन्तर्गत आने वाले मामलों में वह सत्ता के आदेशों को आँख मींचकर स्वीकार करता है। स्वीकृति का क्षेत्र सीमित होता है तथा घटता-बढ़ता रहता है। सामान्यतया अधीनस्थ की यह प्रवृत्ति रहती है कि वह प्रत्येक विषय में प्राधिकारी के आदेशों का पालन करेक्योंकि ऐसा करने में वह उत्तरदायित्व से बच जाता है। अधीनस्थ की दृष्टि से आवश्यक है कि आदेश समस्त संगठन के लिए हितकारी हों तथा उसके व्यक्तिगत हित में भी हों। वह पुरस्कार, प्रशंसालालच या दण्ड के भय से भी आदेशों को पालन कर सकता है। जब सत्ताधारी में कोरी सत्ता के अलावानेतृत्व तथा अन्य व्यक्तिगत गुण होंतब अधीनस्थ के लिए आदेशों का पालन स्वाभाविक हो जाता है। सत्ता की कुशलता उस समय सर्वाधिक हो जाती है जबकि सत्ताधारी और अधीनस्थों के बीच मूल्यों की समानता स्थापित हो जाती है। सत्ता की स्वीकृति का यह क्षेत्र असीमित नहीं होता और न ही अपरिवर्तित रहता है। सत्ताधारी की स्थिति सत्ताधारी और अधीनस्थ के बीच सम्बन्धों की स्थिति और अन्य तत्वों के आधार पर इसमें कमी और वृद्धि होती रहती है।

 

सत्ता पालन के आधार 

सत्ता के प्रसंग में एक महत्त्वपूर्ण प्रश्न यह है कि व्यक्ति सत्ता का पालन क्यों करते हैं। सत्ता की प्रकृति के सम्बन्ध में प्रमुख रूप से प्रतिपादित दो सिद्धान्तों: औपचारिक सत्ता सिद्धान्त और स्वीकृति सिद्धान्त में इस प्रश्न की व्याख्या की गई है। इसके अतिरिक्त मैक्स वेबरमेरी पार्कर फॉलेट और चेस्टर बर्नार्ड के द्वारा भी इस सम्बन्ध में विचार व्यक्त किए गये हैंलेकिन इस सम्बन्ध में साइमन के विचार अधिक महत्त्वपूर्ण हैं। साइमन ने सत्ता पालन के प्रमुख रूप से चार आधार बतलाए हैंजो इस प्रकार हैं:

 

1. विश्वास - 

विश्वाससत्ता के पालन के सम्भवतया सबसे प्रमुख आधार है। अधीनस्थ सत्ताधारी के प्रति विश्वास के कारण उसके आदेशों का पालन करते हैं। इसी कारण सत्ताधारी के प्रति अधीनस्थों का विश्वास जितना गहरा होता है सत्ताधारी के आदेशों का पालन उतना ही सरल और स्वाभाविक हो जाता हैलेकिन जब विश्वास की स्थिति को आघात पहुँचता है तो सत्ताधारी के लिए आदेशों का पालन करवाना उतना ही कठिन हो जाता है और आदेशों का पालन करवाना उतना ही कठिन हो जाता है और आदेशों का पालन करवाने के लिए दबाव की शक्ति का सहारा लेना होता है।

 

2. एकरूपता : 

यह मानव स्वभाव है कि वह उन लोगों के परामर्शसुझाव और आदेशों को अधिक महत्त्व देता है। जो उसके साथ विचारों और आदर्शों की एकरूपता रखते हैं। सत्ता पालन के प्रसंग में एकरूपता के महत्त्व को स्वीकार करते हुए ही राज व्यवस्थाएं उदारवादसाम्यवाद या फासीवाद में से अपने अनुकूल किसी विचारधारा का प्रतिपादन करती हैं तथा राजनीतिक नेतृत्व अधीनस्थों एवं सामान्य नागरिकों को अपने अनुकूल ढालने का प्रयत्न करता है।

 

3. दबाव: 

अनेक बार दबाव और बाध्यकारी शक्ति सत्ता पालन के आधार के रूप में कार्य करते हैं। प्रत्येक संगठन और प्रत्येक राज व्यवस्था में अल्प संख्या में ऐसे व्यक्ति होते हैं जिन पर विश्वास या एकरूपता का प्रभाव कम पड़ता है और जो दमन और दबाव की भाषा ही समझते हैं। सत्ताधारी का प्रयत्न यह होना चाहिए कि सत्ता पालन के प्रमुख आधार के रूप में दबाव को अपनाने की आवश्यकता न पड़े। इस दृष्टि से आवश्यक है कि सत्ताधारी के आदेशों का औचित्य स्वतः स्पष्ट हो।

 

4. वैधानिकताः

प्रत्येक संगठन में एक पद सोपानात्मक व्यवस्था होती है और इस पद सोपान में सत्ताधारी को उच्च स्थिति प्राप्त होने के कारण सत्ता और सत्ताधारी के आदेशों को वैधता प्राप्त हो जाती है। साइमन के मत में, 'सत्ता को इस मान्यता के कारण स्वीकार किया जाता है कि उच्च प्राधिकारी के आदेशों का पालन किया जाना चाहिए।वैधानिकता का महत्त्व इस बात से स्पष्ट है कि जब कभी सत्ता के प्रसंग में 'वैधता का संकट खड़ा हो जाता हैतब सत्ता की प्रभावशीलता को गहरा आघात पहुँचता है।

 

वस्तुतः ये सभी तत्व सत्ता पालन के मिले-जुले आधार के रूप में कार्य करते हैं। कभी विश्वास प्रमुख आधार बन जाता है और कभी दबाव व्यवस्था की श्रेष्ठता का प्रतीक और प्रमाण यह होता है कि विश्वास सत्ता पालन का प्रमुख आधार हो और दबाव इस प्रसंग में गौण तत्व बना रहे।

 

सत्ता की सीमाएं

 

सत्ता के बिना व्यवस्थित समाज की कल्पना नहीं की जा सकतीलेकिन सभ्य और सुसंस्कृत समाज सत्ता की कुछ सीमाएं निर्धारित कर देता हैजिनका पालन किया जाना नितान्त आवश्यक होता है। सत्ता की सीमाओं का आशय हैसत्ता के प्रयोग और परिचालन पर प्रतिबन्ध जिससे सत्ता का मनमाना प्रयोग न किया जा सके। सत्ता को संवैधानिक कानूनों एवं राजनीतिक परिस्थितियों में रहकर कार्य करना होता है तथा वह संस्कृतिमूल्योंपरम्पराओं और नैतिक अवधारणाओं का उल्लंघन नहीं कर सकती सत्ता की ये सीमाएं प्राकृतिकनैतिक उद्देश्यगतआन्तरिक बाहरी या प्रक्रिया सम्बन्धी भी हो सकती है। सत्ता की सीमाओं का संक्षिप्त उल्लेख इस प्रकार है:

 

1. प्राकृतिक सीमा: 

संविधान में मूल अधिकारों का उल्लेख हो अथवा न होकिसी भी राज व्यवस्था को यह अधिकार नहीं हो सकता कि वह नागरिकों को उनके जीवनसामान्य स्वतन्त्रताओं और सीमित सम्पत्ति से भी वंचित कर दे। यह सत्ता की प्रथम प्राकृतिक और अनिवार्य सीमा है और इस सीमा का उल्लंघन करने वाली सत्ता का पतन निश्चित है।

 

12. नैतिक- धार्मिक विश्वासः 

नैतिकता और धार्मिक विश्वास भी सत्ता की अनिवार्य सीमा है। जब कोई सत्ता नैतिकता और धार्मिक विश्वास के प्रतिकूल आदेश देती हैतब उसका पालन करवाना बहुत अधिक कठिन हो जाता है।

 

3. संस्कृतिः 

संस्कृति लोगों के उस जीवन ढंग का नाम है जो अपने-आपको कलासाहित्यधर्मफैशनसंगीत और आचार-विचार के रूप में प्रकट करती है। सत्ता को संस्कृति या समाज के सांस्कृतिक जीवन में हस्तक्षेप करने का अधिकार नहीं हो सकता और न ही संस्कृति के क्षेत्र में उसके द्वारा कुछ किया जा सकता है।

 

4. संविधाननियम और उपनियमः 

संविधान राजसत्ता का अन्तिम स्रोत होता हैअतः सर्वोच्च सत्ता के लिए भी संविधान के प्रावधानों का पालन आवश्यक होता है। इसके अतिरिक्तप्रत्येक व्यवस्था कुशल कार्य संचालन के लिए नियम-उपनियम बना लेती है। ये नियम उपनियम भी सत्ता की सीमाएं निर्धारित कर देते हैं।

 

5. आर्थिक सीमाएं: 

प्रत्येक राज व्यवस्था के आर्थिक साधन और आर्थिक क्षमताएं सीमित होती हैं। अतः ये आर्थिक साधन और क्षमताएं सत्ता को सीमित करने की प्रवृत्ति रखते हैं।

 

6. अधीनस्थों की क्षमताएं और अधीनस्थों द्वारा निर्मित संघ

कोई भी सत्ता अपने निर्णयों को लागू करने और आदेश मनवाने का कार्य अधीनस्थों के माध्यम से करती है। अतः अधीनस्थों की क्षमता की सीमाएं सत्ता की सीमा निर्धारित कर देती हैं। इसके अतिरिक्त विभिन्न व्यवस्थाओं में प्रायः उनमें कार्य करने वाले कर्मचारी अपने निजी हितों की वृद्धि के लिए संघ आदि बनाकर सामूहिक सौदेबाजी करते हैंयह स्थिति भी सत्ता पर अवरोध लगा देती है। 


7. अन्तर्राष्ट्रीय संगठन और अन्तर्राष्ट्रीय कानूनः 

वर्तमान समय में संयुक्त राष्ट्र संघ और अन्य अन्तर्राष्ट्रीय संगठनों के अस्तित्व और अन्तर्राष्ट्रीय कानूनों की आंशिक मान्यता ने भी सत्ता पर सीमाएं लगा दी हैं। यद्यपि अन्तर्राष्ट्रीय संगठन और अन्तर्राष्ट्रीय कानूनों को बाध्यकारी शक्ति प्राप्त नहीं हैलेकिन साथ ही यह सत्य है कि राजसत्ता द्वारा मनमाने तौर पर इनकी अवहेलना नहीं की जा सकती ।

 

इन सबके अतिरिक्त भी सत्ता की कुछ सीमाएं हैं। प्रत्येक राज व्यवस्था के कुछ निर्धारित और उद्घोषित लक्ष्य होते हैं तथा सत्ता इन लक्ष्यों एवं आदर्शों का उल्लंघन नहीं कर सकती। सत्ता की कुछ तकनीकी सीमाएं और कुछ मनोवैज्ञानिक सीमाएं भी होती हैं। 

राजनैतिक चिन्तन की सार्थकता सत्ता को सामर्थ्य प्रदान करने तथा साथ ही साथ उस पर सीमाएँ लगाने में ही हैजिससे सत्ता की जनहितकारिणी स्थिति बनी रहे।

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