राजनीति में औचित्यपूर्णता या वैधता |Legitimacy in Politics

 

राजनीति में औचित्यपूर्णता या वैधता (Legitimacy)

राजनीति में औचित्यपूर्णता या वैधता |Legitimacy in Politics


 

औचित्यपूर्णता या वैधता का महत्त्व ( Importance of Legitimacy): 

औचित्यपूर्णता की धारणा अत्यन्त प्राचीन हैलेकिन वर्तमान समय और सन्दर्भों में इसने नवीन अर्थ प्राप्त कर लिये हैं। सभ्यता और संस्कृति तथा राजनीतिक विकास के साथ-साथ मानवीय जीवन और व्यवहार में दमनात्मक शक्ति सम्बन्धों की भूमिका कम होती जा रही है और शक्ति के अदमनात्मक तत्वों जैसेप्रभावसत्ता और नेतृत्व की भूमिका निरन्तर बढ़ती जा रही है। शक्ति के दमनात्मक और अदमनात्मक दोनों ही श्रेणी के तत्वों पर यह बात समान रूप से लागू होती है कि जब वे वैधता या औचित्यपूर्णता के साथ जुड़ जाते हैं तो उनकी शक्ति और प्रभाव बहुत बढ़ जाता हैलेकिन जब उन्हें औचित्यपूर्णता की स्थिति प्राप्त नहीं होती अथवा जब उनकी औचित्यपूर्णता पर सन्देह उत्पन्न हो जाता हैतब मानवीय व्यवहार को प्रभावित करने के सम्बन्ध में उनकी सीमाएँ बहुत अधिक बढ़ जाती हैं। शक्तिप्रभाव और सत्ता - औचित्यपूर्णता की स्थिति प्राप्त करके ही प्रभावशाली और दूसरों के व्यवहार को परिवर्तित करने में सफल होते हैं। डैल के अनुसारराजनेतागण अपने कार्यों को औचित्यपूर्णता के वस्त्र पहनाते हैं और ऐसा हो जाने पर ही उन्हें सत्ता की स्थिति प्राप्त होती है। दूसरे शब्दों में प्रभाव को सत्ता के रूप में स्थापित करने का कार्य औचित्यपूर्णता के आधार पर ही सम्भव होता है। यह तथ्य इतना अधिक महत्त्वपूर्ण है कि मैक्स वेबर ने केवल औचित्यपूर्ण सरकारों और सत्ताओं का ही विश्लेषण करना अपना मूल विषय माना है।

 

लोकतन्त्र में विशेष महत्वः 

सभी राजनीतिक व्यवस्थाओं की प्रभावशीलता औचित्यपूर्णता पर निर्भर करती हैलेकिन लोकतन्त्रीय व्यवस्था में औचित्यपूर्णता का महत्त्व सर्वाधिक है। लोकतन्त्र जन सहमति पर आधारित शासन होता हैअतः लोकतन्त्र में भय और आतंक के आधार पर जनता से आज्ञापालन करा पाना बहुत अधिक कठिन हो जाता हैइसलिए लोकतन्त्रीय व्यवस्था को औचित्यपूर्णता की सर्वाधिक आवश्यकता पड़ती है। बलदमन आदि का प्रयोग बहुत कम मात्रा में होना चाहिए इनका अधिक प्रयोग किये जाने पर सत्ता अपनी औचित्यपूर्णता खो बैठती है जो कालान्तर में समस्त राजनीतिक व्यवस्था के लिए घातक स्थिति होती है। व्यक्ति और सत्ता के बीच अच्छे सम्बन्धों की स्थापना के लिए यह नितान्त आवश्यक है कि सत्ता के द्वारा अधिक-से-अधिक सम्भव सीमा तक औचित्यपूर्णता की स्थिति प्राप्त की जाय। अतः राजनीतिक व्यवस्थाएँ सदैव और सर्वत्र औचित्यपूर्णता की तलाश में रहती हैं। एस. एम. लिपसेट का कथन है कि "किसी विशिष्ट लोकतन्त्र की स्थिरता न केवल आर्थिक विकास पर हीअपितु वहाँ की राजनीतिक व्यवस्था की वैधता और क्षमता पर भी निर्भर करती है। "

 

औचित्यपूर्णता : अवधारणा का विकास

 

इस शब्द की व्युत्पत्तिलैटिन भाषा के 'Legitumus' से हुई है और मध्यकाल में इसे 'Legitimitas' या आंग्ल भाषा में 'Lawful' अर्थात् 'वैधानिककहा गया। औचित्यपूर्णता के विचार या धारणा का अपना एक लम्बा इतिहास है। प्लेटो ने 'न्यायभावना के अन्तर्गत औचित्यपूर्णता का बीजारोपण कर दिया था। उसके अनुसार प्रत्येक शासन का बुद्धिपूर्ण आधार होना चाहिए तथा उसकी जड़ें नैतिक मूल्योंदीर्घकालीन विश्वासों और सामान्य स्वीकृति की गहराई में गयी हुई होनी चाहिए। अरस्तु ने कानून-शासन या संवैधानिक शासन के रूप में इस अवधारणा का चित्रण किया है। सिसरो ने 'Legitimum' शब्द का प्रयोग विधि द्वारा गठित शक्तियों या न्यायाधीशोंके लिए किया है। बाद में इसका प्रयोग प्राचीन परम्पराओं के प्रति अनुकूलतारूढ़िगत क्रियाविधियोंसंवैधानिक नियमों एवं सुव्यवस्था के तत्वों के लिए ग्रहण किया जाने लगा। मध्यकाल में अत्याचारी अथवा अपहर्ता शासक तथा न्याययुक्त शासक के बीच अन्तर बतलाते हुए इसका उल्लेख किया गया। अरस्तु से तर्क ग्रहण करते हुए मार्सेलियो ऑफ पेडुआ ने इस शब्द की धर्मशास्त्रीय व्याख्या के स्थान पर संवैधानिक व्याख्या प्रस्तुत की। लॉक ने सहमति एवं समझौते की धारणा के माध्यम से इस विचार का दृढ़ समर्थन किया।

 

आधुनिक युग में एक सार्वभौमिक धारणा के रूप में इसका पहली बार प्रतिपादन मैक्स वेबर द्वारा किया गया। उसके अनुसार औचित्यपूर्णता विश्वास पर आधारित होती है और राजनीतिक व्यवस्था के लिए आज्ञापालन की स्थिति प्राप्त करती है। मैक्स वेबर ने औचित्यपूर्णता के आधारों पर भी विस्तृत विचार किया है। उसने औचित्यपूर्णता के तीन आधार बतलाये हैं: परम्परागतबौद्धिक कानूनी और करिश्मात्मक। एक अन्य विचारक कार्ल स्कमिट (Carl Schmitt) ने लोकतान्त्रिक औचित्यपूर्णता की समस्या पर विचार किया है। गुगलील्मो फैरो (Gugleilmo Ferro) ने लोकतान्त्रिक औचित्यपूर्णता के दो आधार (1) बहुमत तथा (2) अल्पसंख्यक विरोधी दल बताये हैं। वह मतैक्य को औचित्यपूर्णता का अनिवार्य तत्व नहीं मानता। लोकतन्त्रीय राजनीतिक व्यवस्था के अन्तर्गत औचित्यपूर्णता के प्रसंग में एक महत्त्वपूर्ण तथ्य यह है कि एक सीमित मात्रा में विरोध का अस्तित्व भी औचित्यपूर्णता का परिचायक समझा जाता है।

 

औचित्यपूर्णता : व्याख्या 

औचित्यपूर्णता एक ऐसी स्थिति का नाम है जिसके अन्तर्गत एक राजनीतिक व्यवस्था के सामान्य जन को यह विश्वास होता है कि सत्ता धारक की सत्ता और उसका प्रयोग सामान्य स्वीकृत नियमों और क्रियाविधियों पर आधारित है। डोल्फ स्टर्नबर्जर ( Dolf Sternberger) ने इसे शासकीय शक्ति की नींव माना है जिसके अनुसार सरकार को यह चेतना रहती है कि उसे शासन करने का अधिकार है तथा दूसरी ओर शासितों द्वारा उस अधिकार को स्वीकार किया जाता है।

 

औचित्यपूर्णता की कुछ महत्त्वपूर्ण परिभाषाएँ इस प्रकार हैं- 

 

एस. एम. लिपसेट के अनुसार, “औचित्यपूर्णता का अभिप्राय व्यवस्था की उस योग्यता और क्षमता से है जिसके द्वारा यह विश्वास उत्पन्न किया और स्थिर रखा जाता है कि वर्तमान राजनीतिक संस्थाएँ समाज हेतु सर्वाधिक समुचित हैं। "

 

प्रसिद्ध आधुनिक विचारक जीम ब्लोण्डैल के विचारानुसार, “ औचित्यपूर्णता से अभिप्राय वह सीमा है जिस सीमा तक लोग उस संगठन कोजिससे वह सम्बन्धित हैंबिना पूछताछ के तथा स्वाभाविक रूप में ही स्वीकार करते हैं सहमति या स्वीकृति का क्षेत्र जितना विशाला होगाउस संगठन का उतना ही अधिक औचित्य होगा । "

 

कूहन एल्फ्रेड के कथनानुसार “ औचित्यपूर्णता का अर्थ शासकों और शासितों के मध्य एक समझौते की स्वीकृति है। इसके अत्यन्त आरम्भिक रूप से यह लोगों का एक ऐसा समझौता है जिसके अधीन लोग जीवित रहने और बन्दीगृह से बाहर रहने के बदले सरकार के आदेशों का पालन करना और कर देना स्वीकार करते हैं। "

 

औचित्यपूर्णता की उपर्युक्त परिभाषाओं से यह स्पष्ट है कि औचित्यपूर्णता का अर्थ उस सहमति या स्वीकृति से है। जो लोगों द्वारा राजनीतिक व्यवस्था के सम्बन्ध में दी जाती है। यदि किसी राजनीतिक व्यवस्था या किसी संस्था को लोगों की ऐसी स्वीकृति प्राप्त नहीं होतीतो उस व्यवस्था में वैधता की कमी हो जाती है और ऐसी व्यवस्था अधिकांश समय तक अस्तित्व में नहीं रह सकती। शक्ति के प्रयोग से या शक्ति का प्रयोग करने की धमकी से प्राप्त की गयी लोगों की स्वीकृति किसी राजनीतिक व्यवस्था या संस्था को वैधता प्रदान नहीं कर सकती। दूसरे शब्दों मेंलोगों की यह स्वीकृति उनके इस विश्वास पर आधारित होनी चाहिए कि वह राजनीतिक व्यवस्था अन्य व्यवस्थाओं की अपेक्षा अधिक उचित एवं समीचीन हैयह राजनीतिक व्यवस्था लोगों के मानसिक मूल्यों के अनुसार है और उस राजनीतिक व्यवस्था के द्वारा लोगों की उचित आवश्यकताएँ वैध रूप में पूर्ण होती हैं। यदि किसी भय या लालसा के कारण लोग राजनीतिक व्यवस्था या अन्य संस्थाओं के प्रति सहमति व्यक्त करते हैं तो हम यह नहीं कह सकते कि उस व्यवस्था को वैधता या औचित्यपूर्णता प्राप्त है। साधारण शब्दों मेंऔचित्यपूर्णता का स्रोत भय या प्रलोभन के आधार पर प्राप्त की गयी लोगों की स्वीकृति नहीं अपितु उनके 'विश्वासों एवं मूल्यों' (Beliefs and Values) पर आधारित ऐच्छिक स्वीकृति है।

 

औचित्यपूर्णता की विशेषताएँ (Characteristics of Legitimacy) 

वैधता या औचित्यपूर्णता कोई भौतिक वस्तु नहीं है जिसके कोई निश्चित निर्धारक तत्व या निर्माणकारी तत्व बतलाये जा सकेंअपितु यह तो एक धारणा हैराजनीतिक जीवन की एक स्थिति है जिसकी अपनी कुछ विशेषताएँ बतलायी जा सकती हैं। औचित्यपूर्णता की विशेषताओं का स्तर और प्रभाव विश्व के समस्त देशों में एक जैसा नहीं हो सकताअपितु ये विशेषताएँ सम्बन्धित देश के लोगों के मानसिक स्तरराजनीतिक मूल्य-विश्वास और आदतें तथा उनकी राजनीतिक चेतना की मात्रा पर निर्भर करती हैं।

 

औचित्यपूर्ण की कुछ मुख्य और सामान्य विशेषताएँ निम्नलिखित शीर्षकों के अन्तर्गत बतलायी जा सकती है:

 

1. औचित्यपूर्णता की धारणा में एक विशेष विश्वास विकसित करने की व्यवस्था की क्षमता सम्मिलित हैं: 

किसी राजनीतिक व्यवस्था का औचित्य इस बात पर निर्भर करता है कि वहाँ के लोग अपने विश्वासों के आधार पर उस प्रणाली को किस सीमा तक वैध समझते हैं। यदि कुछ व्यक्तियों ने अपने संकुचित हितों को सामने रखकर रक्त क्रान्ति या अन्य किसी अवैधानिक साधन द्वारा शासन शक्ति को अपने हाथ में ले लिया हैतो ऐसे व्यक्तियों की शक्ति को लोगों की स्वाभाविक स्वीकृति प्राप्त नहीं हो सकती। परन्तु सम्भव है कि कुछ समय पश्चात् लोग यह स्वीकार करने लगें कि नयी सरकार उनके हितों के अनुकूल है। यदि लोगों में ऐसा विश्वास उत्पन्न हो जाये तो उस राजनीतिक व्यवस्था को वैधता प्राप्त हो जाती है। इस प्रकार औचित्यपूर्णता की धारणा में राजनीतिक व्यवस्था की यह योग्यता सम्मिलित है कि वह लोगों में इस विश्वास को उत्पन्न करें और बनाये रखें कि यह राजनीतिक व्यवस्था और उसके अन्तर्गत स्थापित की गयी संस्थाएँ उनके हितों की दृष्टि से सर्वाधिक उपयुक्त हैं।

 

2. औचित्य की धारणा के साथ प्रभावकता की धारणा सम्बद्ध है प्रो. लिपसेट का कथन है कि किसी राजनीतिक व्यवस्था की स्थिरता और उसकी वैधताउसकी प्रभावकता पर निर्भर है। किसी व्यवस्था को वैधता तभी प्राप्त हो सकती हैं जबकि उसने कुछ सीमा तक प्रभावकता प्राप्त कर ली है। वैधता की स्थिति प्राप्त करने के लिए जरूरी है कि राजनीतिक व्यवस्था केवल कहने भर के लिए ही नहीं होवरन् उसके द्वारा नागरिकों के जीवन पर आवश्यक प्रभावी नियन्त्रण रखा जा सके। 'सज्जन की रक्षा और हित वृद्धि तथा दुर्जन को दण्डकौटिल्य के अनुसार राज्य का आवश्यक कार्य है और राजनीतिक व्यवस्था को वैधता तभी प्राप्त होती है जबकि उसके द्वारा प्रभावशाली रूप में इस कार्य को सम्पन्न किया जाए।

 

3. किसी व्यवस्था का औचित्य सम्बन्धित लोगों के मूल्यों पर निर्भर करता है: 

किसी व्यवस्था को लोगों की स्वाभाविक या ऐच्छिक सहमतिदूसरे शब्दों में वैधता तभी प्राप्त होती है जबकि वह देश की सर्वसामान्य जनता के मूल्यों और विश्वासों पर आधारित हो। उदाहरण के लिएयदि किसी देश में लोकतन्त्र की जड़ें गहरी जमी हुई हैं तो ऐसी सरकार को वैधता की स्थिति प्राप्त होना बहुत अधिक कठिन हो जाता है जिसने गैर-लोकतान्त्रिक और गैर-संवैधानिक तरीकों से सत्ता प्राप्त की हो।

 
4. वैधता शक्ति को सत्ता में परिवर्तित करने का गुण है: 

एक राजनीतिक कहावत है, 'उचित शक्ति ही सत्ता होती है' (Legitimate Power is Authority), इसका आशय यह है कि शक्ति को सत्ता की स्थिति तभी प्राप्त होती है जबकि उसने जनसामान्य की दृष्टि में वैधता को प्राप्त कर लिया हो। यदि किसी व्यक्ति या संस्था के पास शक्ति का अस्तित्व है और उसके द्वारा दबाव या भय के आधार पर अपने आदेशों का पालन करवाया जाता है तो इसका आशय यह है कि वह व्यक्ति या संस्था केवल शक्ति सम्पन्न हैसत्ता सम्पन्न नहीं। यदि शक्ति लोगों की विवेकयुक्त कसौटी पर पूरी नहीं उतरतीतो उसे सत्ता का नाम नहीं दिया जा सकता। इसका अभिप्राय यह है कि वैधता ही एक ऐसा गुण हे जो शक्ति को सत्ता में परिणत करता है।

 

5. वैधता विशाल सामाजिक स्वीकृति पर आधारितः 

किसी व्यवस्था की वैधता कुछ एक विशेष व्यक्तियों की सहमति पर नहींवरन् विशाल सामाजिक सहमति पर निर्भर होती है। यह विशाल सहमति या स्वीकृति किसी बाहरी दबाव या प्रभाव के कारण नहीं होनी चाहिएवरन् इसका आधार सम्बन्धित लोगों की विवेकशीलता और उनके अपने विश्वास या विचार होने चाहिए।

 

इस प्रकार वैधता कुछ विशेष लोगों या केवल अभिजन पर निर्भर नहीं करतीवरन् विशाल सामाजिक स्वीकृति पर आधारित होती है।

 

वैधता की धारणा मूलतः उस योग्यता पर आधारित है जिस योग्यता द्वारा लोगों को राजनीतिक व्यवस्था के अच्छे होने के प्रति विश्वास करवाया जा सकता है। वैधता की धारणा मुख्यतया विशाल सामाजिक स्वीकृति पर आधारित है और वैधता वह गुण है जो शक्ति को सत्ता में परिवर्तित करता है। किसी व्यवस्था की वैधता इस बात पर निर्भर करती है कि उसकी कार्यप्रणाली और स्वरूप सम्बद्ध लोगों के मूल्यों और विश्वासों के अनुकूल होने चाहिए । इस सम्बन्ध में प्रो. लिपसेट लिखते हैं कि समूह राजनीतिक व्यवस्था को वैध या अवैध इस आधार पर समझते हैं कि राजनीतिक व्यवस्था के मूल्यों का उनके अपने मूल्यों से सामंजस्य है अथवा नहीं""

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