प्राचीन काल में साहित्य और शिक्षण संस्थाएँ | पुनर्जागरण काल में साहित्य और शिक्षण| Renaissance History in Hindi

 

 प्राचीन काल में साहित्य और शिक्षण संस्थाएँ 

प्राचीन काल में साहित्य और शिक्षण संस्थाएँ | पुनर्जागरण काल में साहित्य और शिक्षण| Renaissance History in Hindi

पुनर्जागरण काल में साहित्य और शिक्षण (Education and Literature in Renaissance) 

 

मध्य युग में लोगों की रुचि आत्मामुक्तिईश्वरचर्च और शासक के सम्बन्ध में विचार करने के प्रति थी। मनुष्य का व्यक्तित्व उस काल में तनिक भी महत्त्वपूर्ण नहीं थाकिन्तु पुनर्जागरण के प्रभाव से अब लोगों का दृष्टिकोण बिल्कुल बदल गया। अब स्वर्ग-नरक और ईश्वर तथा धर्म के प्रति लोगों का आकर्षण बहुत कम हो गया और उन्होंने व्यक्ति तथा संसार की प्रगति की ओर अपना ध्यान केन्द्रित किया।

 

पुनर्जागरण काल में साहित्य और शिक्षण (Education and Literature in Renaissance)

 

सामान्यतया इटली को पुनर्जागरण का जन्म स्थान माना जाता है। इसका कारण यह बताया जाता है कि कुस्तुनतुनिया से भाग कर आने वाले बहुत से विद्वान मूल्यवान पुस्तकें तथा पाण्डुलिपियाँ लेकर इटली आ गए। इन लोगों का यहाँ स्वागत हुआ क्योंकि दाँते और पैट्रार्क व बोकासियो जैसे विद्वान यहाँ तेरहवीं और चौदहवीं शताब्दी में अपनी रचनाओं से लोगों पर प्रभाव डाल चुके थे।

 

पुनर्जागरण युग के बड़े साहित्यकार 

साहित्य में पुनर्जागरण- अब हम पुनर्जागरण युग के कुछ बड़े साहित्यकारों का उल्लेख करेंगेजिनके कार्य आज भी संसार की दृष्टि में आदर्श स्वरूप माने जाते हैं।

 

दाँते (Dante 1265-1321 ई.) - 

वह फ्लोरेंस निवासी था। उसका विख्यात महा-काव्य 'डिवाइन कॉमेडी (Divine Comedy ) था । यह इस काल का सबसे बड़ा साहित्यिक ग्रन्थ माना जाता है। यह ग्रन्थ लैटिन में नहीं बल्कि इटैलियन भाषा में लिखा गया । इटैलियन भाषा उस समय की जन भाषा थी। यद्यपि इस ग्रन्थ में एक तीर्थ यात्रा का वर्णन है किन्तु देश-प्रेमप्रकृतिनिरीक्षणमानव प्रेम और स्वतन्त्र अभिरुचि आदि के कारण यह पुनर्जागरण का मार्ग दिखलाने वाला था।

 

पैट्रार्क (Patrarch, 1304-1374 ई.) - 

इटली निवासी पैट्रार्क मानववाद (ह्यूमैनिज्म) का सबसे पहला एवं बड़ा प्रतिनिधि है। वह पहला विद्वान् था जिसने यूनान एवं रोम के प्राचीन साहित्य के मूल ग्रन्थों के महत्त्व को पहचाना और दूसरों को बताया। प्राचीन लैटिन साहित्य से उसे बड़ा प्रेम था। बर्जिस सिसरो और लिवि की रचनाओं के प्रति जनता में रुचि पैदा करने हेतु उसने बड़ा प्रयत्न किया। वह एक कवि था और लैटिन और देशीय भाषाओं में कविता लिखता था।

 

बुकेशियो (Boccaccio, 1331-1375 ई.) - 

बुकेशियो एक विख्यात लेखक था। उसका ग्रंथ डेकैमरान (Decameron) विख्यात है। इसमें कुछ बड़ी रोचक कहानियाँ हैं। इंग्लैंड के प्रसिद्ध कवि चासर ने बुकेशियो के इसी ग्रंथ से प्रेरित होकर "कैण्टरबरी टेल्स" की रचना की।

 

लौरेंजो डी मैडीसी - 

इस युग का सबसे बड़ा गद्य लेखक लौरेंजो-डी-मैडीसी था। यह फ्लोरेंस का राजनैतिक नेता था। यह भी लैटिन भाषा का अच्छा विद्वान् और कवि था। इसने फ्लोरेंस में एक पुस्तकालय और एक विद्यालय खोलाजहाँ ग्रीक ग्रन्थ पढ़ाये जाते थे।

 

इटली के अन्य विद्वान

अन्य लेखक कौसीमो डी मैडीसी और मिरडोन्लो थेजो कई भाषाओं के अच्छे विद्वान् और लेखक थे। इनके अतिरिक्त दो कवि एवं लेखक टैमो और एरियस्टो (1474-1533 ई.) थे। राजनीति का सबसे बड़ा लेखक मैकियावेली (Machiavelli, 1469-1527 ई.) था। उसके लिखे ग्रन्थ 'दी प्रिंसऔर दी आर्ट आफ वार" बहुत ही विख्यात हैं। इनमें राजनीति के जिन सिद्धान्तों की चर्चा की गई हैइनकी तुलना चाणक्य के अर्थशास्त्र से की जा सकती है।

 

डेसीडेरियस इरास्मस (1479-1536 ई.) 

यह हालैंड का विख्यात विद्वान् था। उसका लिखा एक ग्रंथ "दी प्रेज ऑफ फॉली" (The Praise of Folly) बहुत ही विख्यात है। यह एक व्यंग्यात्मक कविता या सेटायर (Satire ) है जिसमें इसने पादरियों के दुराचारों और ईसाई धर्म की कुरीतियों की खुले एवं जोरदार शब्दों में निन्दा की है। इस कारण बहुत से विद्वानों का यह कहना है कि इरास्मस के इस लेख ने चर्च एवं पादरियों के लिए साधारण लोगों की श्रद्धा और सम्मान बहुत कम कर दिये। इरास्मस ने यूरोप के कई देशों की यात्रा की थी। इंग्लैंड के पुनर्जागरण एवं धर्म-सुधार का तो उसे मार्गदर्शक कहना ही उचित है। इंग्लैंड के विद्वान् भी उसे अपना नेता मानते थे।

 

चासर (Chaucer, 1340-1400 ई.) - 

चासर का पूरा नाम जियोफरी चासर था। वह इंग्लैंड का जन भाषा का लेखक था। वह कई बार इटली गया था और बोकेशियो से बहुत प्रभावित था। उसकी प्रसिद्ध पुस्तक कैंटरबरी टेल्स (Canterbury Tales) है। यह पुस्तक मध्य युग और आधुनिक युग के बीच की कड़ी मानी जा सकती है। सरवेन्टीज (Cervantez, 1247-1616 ई.) - यह स्पेन का एक प्रसिद्ध लेखक था। इसकी प्रसिद्ध रचना 'डान क्विकजॉट' (Don Quixote) है। इस पुस्तक में एक शेखचिल्ली की कहानी के माध्यम से मध्य युगीन सामन्तों का खूब मजाक उड़ाया गया है।

 

सर टामस मूर (Sir Thomas Moore ) - 

यह एक अंग्रेज विद्वान तथा मानववादी था। उसकी प्रसिद्ध रचना 'यूटोपिया' (Utopia) है। इस पुस्तक में उसने एक ऐसे राज्य की कल्पना की है जो उसकी दृष्टि में आदर्श राज्य है। मूर का यूटोपिया एक कल्पनामय राज्य था। यूटोपिया में वर्णित समाज एक उत्तम समाज है जिसमें नागरिकों को पूर्ण स्वतन्त्रता है। लोगों का अनुमान है कि मूर को इस पुस्तक के लिखने की प्रेरणा प्लेटो की पुस्तक रिपब्लिक (Republic) से मिली थी। फ्रांसिस बेकन और स्पेंसर आदि पर मूर का काफी प्रभाव पड़ा। 


फ्रांसिस रबेले (Francis Rabelais, 1945-1553 ई.) - 

फ्रांसिस रबेले एक महान मानववादी था। यह फ्रांसीसी लेखक व्यक्ति की महत्ता और उसकी प्राकृतिक प्रवृत्तियों का समर्थक था। उसका कहना था कि अपनी सहज प्रवृत्ति के अनुसार मनुष्य जो कुछ भी करता हैउसमें कोई बुरी बात नहीं है। वह एक पादरी था और पादरियों के जीवन के सम्बन्ध में उसे काफी ज्ञान था। उसने पाखण्डी पादरियों की कटु आलोचना की।

 

Note : राजनीति का सबसे बड़ा लेखक मैकियावेली (Machiavelli, 1469-1527 ई.) था। उसके लिखे ग्रन्थ 'दी प्रिंसऔर "दी आर्ट आफ वार" बहुत ही विख्यात हैं। इनमें राजनीति के जिन सिद्धान्तों की चर्चा की गई हैउनकी तुलना चाणक्य के अर्थशास्त्र से की जा सकती है।

 

पुनर्जागरण काल अन्य विद्वान लेखक - 

इनके अतिरिक्त डीन कॉलेटजानफिशकार्डीनल वुल्जे आदि लेखक और मानववादी थे। महाकवि एडमड स्पैन्सर (1552-1599 ई.) एवं नाटकाचार्य शेक्सपीयर (1564-1616 ई.) इंग्लैंड के प्रसिद्ध कवि हुए हैं। इस काल में नाटकों का विषय शिक्षा सम्बन्धी तथा पुराना ही था किन्तु विषय का प्रतिपादन और उसकी शैली बदली हुई थी। मानव जीवन मानव की महत्ता और वैज्ञानिक विचारों को लेकर नाटकों की रचना की गई। शेक्सपीयर के अलावा मालों और राबर्ट ग्रीन भी प्रसिद्ध नाटककार हुए। फ्रांसिस बेकन अपने समय का सबसे बड़ा दार्शनिकराजनीतिज्ञ और अंग्रेजी भाषा में निबन्ध का जन्मदाता माना जाता था। मौन्टेन (Montaigne, 1533-1592 ई.) इस समय फ्रांस का सबसे बड़ा लेखक है जिसकी शैली पर इंग्लैंड में बेकन (Bacon ) ने निबन्ध साहित्य को जन्म दिया।

 

प्राचीन काल में देशी भाषाएं या स्थानीय

भाषाएं पुनर्जागरण का एक प्रभाव यह पड़ा कि हर देश में वहाँ की देशी भाषाओं या स्थानीय भाषाओं का प्रयोग बढ़ा और उनकी उन्नति हुई। इटलीफ्रांसस्पेनइंग्लैंडजर्मनी आदि सभी देशों में वहाँ की भाषाओं में साहित्य की रचना हुई। इस युग में धर्म और दर्शन का प्रभाव समाप्त होने लगा था और व्यक्तियों और सांसारिक विषयों पर लिखा जाने लगा। लेखकों की कहानियों के विषयों के लिए धार्मिक बातों पर निर्भर नहीं रहना पड़ता था। वे जीवन की साधारण घटनाओं को लेकर साहित्य का निर्माण करने लगे और लैटिन भाषा के स्थान पर देशी भाषाओं में ग्रन्थ लिखने लगे।

 

प्राचीन काल में नाटक-

मध्य काल के अन्त में एवं पुनर्जागरण काल में नाटकों की बड़ी उन्नति हुई। अधिकतर नाटक धर्म सम्बन्धी विषयों पर और गिरजे के मंच पर ही खेले जाते थे। इन नाटकों द्वारा महात्मा ईसा के जीवन की घटनायेंउनके चमत्कार और शिष्टाचार की बातें प्रदर्शित की जाती थीं। इन सब नाटकों का तात्पर्य केवल मनोरंजन ही नहीं था। इनका वास्तविक उद्देश्य लोगों की धर्मात्मापुण्यात्माश्रेष्ठ आचरण वाले और अनुशासनपूर्वक जीवन बिताने की शिक्षा देना था। पुनर्जागरण के समय धार्मिक कहानियों या रहस्यात्मक और चमत्कार पूर्ण नाटकों के स्थान पर मानव के प्रतिदिन के जीवन की घटनाओंमानव भावनाओं जैसे विषयों पर नाटक लिखे जाने लगे। मानवीय तत्वों और वैज्ञानिक विचारों के विकास के लिये भी नाटकों की रचना होने लगी। इंग्लैंड में भी आधुनिक नाटक का युग आरम्भ हुआ तथा जॉन रोबर्ट ग्रीन मालों इत्यादि ने आधुनिक नाटकों की रचना की।

 

पुनर्जागरण के संरक्षक

इस समय के पोप निकोलस पंचम ( 1447-1475 ई.)जूलियस द्वितीय (1503-1513 ई.) - एवं लियो दशम नई शिक्षा के बड़े पक्षपाती प्रेमी एवं प्रोत्साहन देने वाले थे। पोप निकोलस पंचम ने अपने महल वैटिकन में एक पुस्तकालय स्थापित कियाजो आज भी विश्व के सर्वोच्च पुस्तकालयों में माना जाता हैं उसी ने रोम में विख्यात गिरजा 'सेन्ट पीटर्सबनवाना आरम्भ किया। इसके लिए उसने दूर-दूर से उच्चकोटि के कारीगरचित्रकारशिल्पकार तथा बहुमूल्य निर्माण सामग्री मँगाई।

 

कला में पुनर्जागरण - 

पुनर्जागरण का प्रभाव कला के प्रत्येक क्षेत्र पर पड़ा। डेविस का कहना है कि पुनर्जागरण मध्यकाल के नियमों और परम्पराओं के बन्धनों के विरुद्ध एक विद्रोह था और कला के क्षेत्र में यह विद्रोह सबसे अधिक उभरा हुआ दिखाई पड़ता है। इस समय की कला नवीन विचारों की प्रतीक है। उसमें मध्य युग की कृत्रिमता के स्थान पर स्वाभाविकता है। इस काल की कला में नई टेकनीक और रंगप्रकाश व छाया (Light and Shade ) की ओर ध्यान दिया गया। सजीवता इस काल की कला का एक विशिष्ट लक्षण है।

 

पुनर्जागरण युग में चित्रकला और चित्रकार  - 

मध्य युग में तथा पुनर्जागरण युग के आरम्भ में कला पर ईसाई धर्म का बड़ा प्रभाव था। ईसाई कला की कोमल और मानवीय भावनाओं को ईसा के चित्रों में प्रदर्शित किया जाता था। परन्तु धीरे-धीरे धर्मशास्त्रियों ने कला को धार्मिक रूप दे दिया। अतः कला की मौलिकता जाती रही। केवल धार्मिक भावना के चित्रों में उलझ कर कला की उन्नति और विकास का मार्ग रुक गया। इटली में कला का पुनर्जागरण बाइजेन्टियन परम्पराओं के विरोध में हुआ था। सिम्बेयु और गिटो ने नवीन शैली को जन्म दिया। गिटो ने धार्मिक एवं घरेलू विषयों को लेकर चित्र बनाये। इटली में चित्रकला का खूब विकास हुआ तथा यह पुनर्जागरण का प्रतीक बन गई। रैफेल और लिओनार्डो दी विसी के चित्रों ने इटली को कला की नई पद्धति या शैली से परिचित कराया। मसाचिओ ने अपने चित्रों में यथार्थवाद (Realism) को मुख्य स्थान दिया।

 

लियोनार्डो दी विन्सी (Leonardo da Vinci 1452-1519 ई.) - 

लियोनार्डो-दी- विन्सी इटली का एक कुशल पेंटरभवन-निर्माता तथा महान चित्रकार था। उसके चित्रों में उसका महान कलाकार मुखर हो उठा है। उसका भित्ति चित्र (Mural Painting) 'दी लास्ट सपरआज भी विश्व का महान चित्र माना जाता है। इसकी दूसरी महान कृति एक महिला का चित्र है। इस चित्र का नाम 'मोनालिसाहै। इस चित्र की कुछ विशिष्टताएँ आज भी कलाकारों को आश्चर्य में डाल देती हैं। मुस्कुराती हुई महिला के इस चित्र में उसकी आँखें और ओठों पर मुस्कान का भाव ऐसा हृदयस्पर्शी तथा विस्मयकारी है कि एक सच्चा कलाकार उसे देखता ही रह जाए। यह चित्र भी विसी का एक अमर चित्र है। विसी ने पेड़-पौधों और मनुष्यों के अनेक चित्र बनाये जिनमें उसने प्रकाश तथा छाया का पुट देकर नई चित्रकला का मार्ग प्रशस्त किया। अपने जीवन के अन्तिम दिनों में विसी इटली छोड़कर फ्रांस चला गया था और फ्रांस के सम्राट फ्रांसिस ने उसका बहुत सम्मान किया।

 

माइकेल एंजिलो (Michael angelo 1475-1564 ई.) - 

माइकेल एंजिलो इटली का निवासी था। वह एक महान चित्रकारमूर्तिकार तथा स्थापत्यकला विशेषज्ञ था। रोम में पोप के राजप्रासाद तथा गिरजाघर में उसने अनेक भित्ति चित्र बनाए । गिरजाघर में 6 हजार वर्गफुट स्थान में उसने लगभग 145 चित्र अंकित कियेजो मानव जीवन की साकार प्रतिमा लगते हैं। कला का जैसा सुघर निखार माइकेल एजिलों की चित्रकारी में मिलता हैवैसा अन्यत्र मुश्किल से ही मिलता है।

 

रफेल (Raphael, 1483-1520 ई.)

इटली के चित्रकारों में रफेल का अपना विशिष्ट स्थान हैउसने भी पोप के राजप्रासाद और गिरजाघर को सजाने के लिए अनेक चित्र बनाए। कला के क्षेत्र में वह लियोनार्डो-दी- विंसी और माइकेल एंजिलो से प्रभावित था किन्तु उसमें अपनी मौलिकता भी थी। रफेल के चित्रों की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि उनमें लम्बाई और चौड़ाई के साथ गहराई (Depth ) का भी अंकन है अनुपातभावअंकनगाम्भीर्यसरलता और यथार्थ प्रकृति-चित्रण की दृष्टि से रफेल के चित्र अनुपम हैं। उसका मडोनास (Madonnas ) चित्र अत्यन्त प्रसिद्ध है। Sistine Madonna नामक चित्र उसका सबसे विख्यात चित्र है।

 

इस काल में जर्मनी में अलब्रेट ड्युरेर व हालबिनहालैंड में हूबर्ट वान इक व रुबेन्स और रैमब्राण्ट और स्पेन में बेलासक्वेज नामक प्रसिद्ध चित्रकार हुए। इस काल में इंग्लैंड के मुख्य कलाकारों में ओडो और गोल्डस्मिथ थे। 


पुनर्जागरण काल में मूर्तिकला तथा वास्तुकला - 

मूर्तिकला और वास्तुकला पुनर्जागरण के दो मुख्य अंग थे। घीबर्टी (Ghiberti) और डोनाटेला ने यथार्थवाद शैली का अनुकरण कियारोखिया ने अलंकारयुक्त मूर्तियाँ बनाई वास्तुकला के क्षेत्र में गोथिक शैली का ह्रास होने लगा। इटली में एक नवीन शैली का विकास हुआजिसमें प्राचीन और नवीन ढंग मिले-जुले थे। उस शैली का ज्वलंत नमूना रोम का 'सैंट पीटर्सका प्रसिद्ध गिरजाघर है। गिरजाघर ही इस युग की सबसे बड़ी शान की वस्तुएँ हैं। प्रत्येक ग्राम एवं नगर में एक गिरजाघर अवश्य होता था। आरम्भ में ये गिरजाघर रोमन शैली पर और उसके पश्चात् गोथिक ढंग से बनाये जाने लगे। इन गिरजाघरों में बड़ा बहुमूल्य और सुन्दर सजावट 'का सामानफर्शकालीनझाड़-फानूस लगाये जाते थे। लकड़ी के सामान पर बढ़िया खुदाई का काम होता था और गिरजा में काम आने वाले बर्तन बड़े बहुमूल्य और रत्नजड़ित होते थे। गिरजाघरों की खिड़कियों आदि में बेल-बूटेदार काँच लगाये जाते थे।

 

पुनर्जागरण के समय के गिरजाघर या अन्य भवन एकदम ऊँचे और एक साथ आकाश की ओर उठते हुए भवनों के स्थान पर यूनानी देवालयों की तरह सीधे और रोमन प्रणाली के अनुसार औसत दर्जे की ऊँची गुम्बद गए। गोल-गोल मेहराबों का स्थान उन्नत मेहराबों ने ले लिया। उस समय के तीन मुख्य गिरजाघर रोम में सेन्ट पीटर्सलन्दन में सेन्ट पॉलवेनिस में सेन्ट मार्क हैं।

 

फ्लोरेंस नगर में इस समय के तीनों विश्वविख्यात कलाकार लिओनार्डो-दी- विसीमाइकेल ऍजिलो और रेफेल हुये। ये सब कई कलाओं में प्रवीण थे। माइकेल एंजिलो एक बड़ा अच्छा चित्रकारशिल्पकार एवं मूर्तिकार था। इसके चित्रों एवं मूर्तियों में शरीर की बनावट और उसके अंग-प्रत्यंग की स्वच्छता इसकी उत्तमता के अच्छे प्रमाण हैं। इनको देखकर आजकल के चित्रकार भी चकित रह जाते हैं। इसके अलावा हालैंड में बड़े चित्रकार दो सगे भाई हूबर्ट एवं जॉन हुये हैं। उनके चित्र बड़े नए ढंग से सुन्दर एवं मनोरंजक हैं। स्पेन में बेलासक्वेज और म्यूरिलो अच्छे कलाकार थे। जर्मनी में अलब्रेट ड्युरेर (1471-1528 ई.) और हालबिन ( 1497-1523 ई.) हुये हैं। इनके चित्रों में अधिकतर महात्मा ईसा के जीवन सम्बन्धी दृश्यनरकस्वर्ग आदि दिखाये गये हैं। कहीं-कहीं इसमें संसारी जीवन एवं घरेलू पारिवारिक जीवन सम्बन्धी विषयों तथा भावनाओं का भी चित्र खींचा गया है। इससे प्रतीत होता है कि कला में अब केवल ईसाई धर्म का ही एकाधिपत्य नहीं था। सब चित्रकार अपने चित्रों में शिल्पकार अपनी मूर्तियों में नई शैली . एवं नई बातों व नये विषयों का रूप दिखाते थे। यूरोप के बहुत से नगरोंमहलोंगिरजाघरोंअजायबघरों आदि में इन कलाकारों की कला की वस्तुएँ आज तक देखी जा सकती हैं।

 

पुनर्जागरण काल में  संगीत - 

इस काल में संगीत में भी अच्छी उन्नति हुई। मध्यकालीन युग के ऐसे यन्त्रों में सुधार किया गयाजो अधिक अच्छे न लगते थे। नये ढंग से अच्छी मधुर आवाज पैदा करने वाले वाद्य यन्त्र बनाये गए। वायलिन और पियानों का आविष्कार भी इसी काल में हुआ था। इस युग के संगीत के विशेषज्ञों में पैलेसट्रीनो (Palestrino) का स्थान सर्वश्रेष्ठ है। उसने पोप की छत्र-छाया में शिक्षा प्राप्त की थी और अपनी योग्यता के कारण वह आधुनिक चर्च - संगीत का जन्मदाता कहलाता है। उसके प्रभाव और प्रेरणा से 17वीं शताब्दी में इटली में और 18वीं शताब्दी में जर्मनी में संगीत का विकास हुआ। इस काल में चर्च के प्रोत्साहन से धार्मिक गीत लिखे गये और उन्हें बड़े लय- स्वर और वाद्य यंत्रों के साथ गाया जाता था।


पुनर्जागरण काल सारांश 

 

  • पुनर्जागरण का एक प्रभाव यह पड़ा कि हर देश में वहाँ की देशी भाषाओं या स्थानीय भाषाओं का प्रयोग बढ़ा और उनकी उन्नति हुई। इटलीफ्रांसस्पेनइंग्लैंडजर्मनी आदि सभी देशों में वहाँ की भाषाओं में साहित्य की रचना हुई।

 

  • मध्य काल के अन्त में एवं पुनर्जागरण काल में नाटकों की बड़ी उन्नति हुई। अधिकतर नाटक धर्म सम्बन्धी विषयों पर और गिरजे के मंच पर ही खेले जाते थे। इन नाटकों द्वारा महात्मा ईसा के जीवन की घटनायेंउनके चमत्कार और शिष्टाचार की बातें प्रदर्शित की जाती थीं।

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