पर्शिया (ईरान) साम्राज्य की सामाजिक आर्थिक अवस्था स्त्रियों की स्थिति | Social Economic Condition Of Persia
पर्शिया (ईरान) साम्राज्य की सामाजिक अवस्था (Social Condition Of Persia)
पर्शिया (ईरान) साम्राज्य की सामाजिक अवस्था
- ईरान के लोग अधिक सुन्दर और बलिष्ठ होते थे। वे वस्त्रों और आभूषणों के बहुत अधिक शौकीन होते थे। पुरुष दाढ़ी और मूँछ रखते थे बाद में सिर में विग धारण करने लगे। स्त्रियों और पुरुषों के वस्त्रों में विशेष अन्तर नहीं था। ईरानी समाज का संगठन काफी अच्छा था जिसे हम निम्नलिखित बिन्दुओं द्वारा अध्ययन कर सकते हैं कौटाम्बिक प्रणाली- समाज में कुटुम्ब को पवित्र माना जाता था। जिसके अधिक पुत्र होते थे उसे भाग्यवान माना जाता था। अधिक पुत्र वाले को राज्य की ओर से पुरस्कृत किया जाता था। प्राण हत्या अपराध माना जाता था। विवाह को पवित्र सम्बन्ध का दर्जा प्राप्त था। जिसे माता-पिता के द्वारा ही सम्पन्न किया जाता था। कहीं पर पिता-पुत्री, भाई-बहन आदि के पारस्परिक विवाह की प्रथा प्रचलित थी। बहु-विवाह या रखैल रखने का प्रचलन था । घर बसाना और सुखमय जीवन व्यतीत करना जीवन का आवश्यक अंग माना जाता था ।
- रहन-सहन एवं खान-पान ईरानवासियों का रहन-सहन बहुत सुन्दर था। वे बड़े उदार, सचरित्र स्पष्ट वक्ता और - आतिथ्य प्रवृत्ति के होते थे। आचार-व्यवहार में वे काफी कुशल थे। आपस में मिलने पर वे गले मिलते थे तथा होंठों का चुम्बन करते थे। वृद्ध के प्रति समाज में श्रद्धा का भाव रखा जाता था। वे दिन में एक बार भोजन करते थे। उनका रहन-सहन सुन्दर और सौन्दर्य प्रसाधनयुक्त था। शरीर की स्वच्छता पर वे बल देते थे। उनका विश्वास था कि स्वच्छ शरीर में ही देवदूत प्रवेश और निवास करते हैं। उत्सव के अवसर पर के सफेद वस्त्र धारण करते थे।
- आमोद-प्रमोद समाज में मनोरंजन का काफी महत्त्व था। उच्च वर्ग के लोगों का मुख्य मनोरंजन आखेट था। सम्राट एवं सामन्त के लिए युद्ध और शिकार ही मुख्य कार्य समझे जाते थे। शिकार के लिए शिकारी कुत्ते भी होते थे। इसके अतिरिक्त ताश खेलना, चित्र खींचना, लकड़ी पर खुदाई करना, रखैल रखना आदि प्रमुख मनोरंजन के साधन थे। रखैलों को वर्ष में एक बार सम्राट के साथ रात्रि-यापन करना पड़ता था। अस्त्र-शस्त्र - आम ईरानी अपने साथ अस्त्र-शस्त्र रखते थे। उनके मुख्य अस्त्र-शस्त्र नालीदार ढाला, तरकश, बल्लम, भाला, तीर-धनुष तथा छुरा थे।
पर्शिया (ईरान) साम्राज्य में स्त्रियों की स्थिति-
- ईरानी समाज में स्त्रियों की स्थिति अच्छी थी। उसे माता के रूप में विशेष सम्मान प्राप्त था । जरथ्रुष्ट और डेरियस के समय में स्त्रियों की स्थिति काफी अच्छी थी। अधिक पुत्रों को जन्म देने वाली माता को विशेष महत्त्व मिलता था। यद्यपि रखैल प्रथा प्रचलित थी, किन्तु वेश्यावृत्ति का प्रचलन समाज में नहीं था। स्त्रियाँ सम्पत्ति की मालकिन समझी जाती थीं। उसे पुरुषों के साथ समस्त कार्य सम्पादित करने का अधिकार प्राप्त था। विधवा विवाह की प्रथा प्रचलित नहीं थी। पर्दे की प्रथा का कठोरता के साथ पालन किया जाता था। भ्रूण हत्या को वे लोग घोर पाप मानते थे। डेरियस के बाद स्त्रियों की स्थिति में गिरावट आने लगी थी।
पर्शिया (ईरान) साम्राज्य की आर्थिक अवस्था (Economic Condition)
कृषि -
- ईरानी समाज की आर्थिक अवस्था काफी उन्नत और उत्तम थी। अधिकतर लोग स्वयं ही खेती करते थे। संयुक्त खेती को वहाँ के लोग अधिक महत्त्व देते थे। किसान मजदूरों से अपने खेतों को जुतवाता था। इसके अतिरिक्त वे इस कार्य के लिए विदेशी गुलामों को रखते थे। किसान का जमीन पर कोई अधिकार नहीं था। उनके मेहनताना के रूप में उपज का एक भाग प्राप्त होता था। खेती के लिए लकड़ी के हलों का प्रयोग किया जाता था जिसमें धातु का फाल लगा होता था। दूर-दूर के पहाड़ों से पानी लाया जाता था। उनके धर्म ग्रन्थों में कृषि को अधिक महत्त्व प्रदान किया गया है।
पशुपालन -
- ईरानी लोग अपने घरों में जानवरों को भी पालते थे। जानवरों में कुत्तों को विशेष महत्त्व प्राप्त था। कुत्तों के द्वारा वे शिकार भी करते थे। इसके अतिरिक्त गाय, बैल, भैंस आदि को वे लोग पालते थे। कुत्ते को गर्म खाना खिलाना अपराध माना जाता था। वे लोग घरों में चिड़ियों तथा उदबिलाव को पालते थे।
उद्योग-धन्धा -
ईरानी समाज के आर्थिक आधार का ढाँचा उद्योग पर भी निर्भर रहता था। वस्त्र उद्योग, धातु उद्योग, शराब उद्योग, काष्ठ उद्योग आदि के धन्धे में वे काफी निपुण थे। उद्योग-धन्धों ने व्यापार को प्रोत्साहन दिया। उनके यहाँ व्यापार बेबीलोनिया, फिनिशिया, यहूदी आदि विदेशी जाति के लोग ही करते थे। व्यापार थल और जल दोनों मार्गों से किया जाता था।
मुद्रा का प्रचलन -
- ईरानियों का विनिमय गल्ला एवं मवेशियों के माध्यम से होता था। प्रारम्भ में किसी भी प्रकार की मुद्रा का प्रचलन नहीं था। सर्वप्रथम उन्होंने लीडिया से इसका ज्ञान सीखा और डेरियस महान ने 'डेरिक' नाम से मुद्राएँ चलायीं। डेरिक का अर्थ होता है सोने का टुकड़ा। मुद्रा सोने और चाँदी दोनों धातु की बनती थी। सोने की डेरिक का मूल्य लगभग 25 रुपया जो चाँदी की मुद्रा से 13.5 गुणा अधिक था। डेरियस के इन सिक्कों का प्रचलन सिन्धु नदी के प्रदेश में भी हुआ और इन्हीं के द्वारा भारतीय मुद्रा प्रणाली का विकास हुआ।
- हरवामशी वंश के शासकों ने आर्थिक अवस्था को सुधारने हेतु विभिन्न प्रान्तों से कर संग्रह करने का आदेश दिया था। विभिन्न प्रान्तों के भिन्न-भिन्न कर निर्धारित थे। कहा जाता है कि डेरियस महान का शासनकाल आर्थिक दृष्टि से काफी सम्पन्न था और राजकोष सदैव भरा-पूरा रहता था। आर्थिक सम्पन्नता से साम्राज्य का चतुर्दिक विकास हुआ था।
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